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सरशार सिद्दीक़ी

1926 - 2008 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 10

शेर 7

उजड़े हैं कई शहर, तो ये शहर बसा है

ये शहर भी छोड़ा तो किधर जाओगे लोगो

नींद टूटी है तो एहसास-ए-ज़ियाँ भी जागा

धूप दीवार से आँगन में उतर आई है

इक कार-ए-मुहाल कर रहा हूँ

ज़िंदा हूँ कमाल कर रहा हूँ

मैं ने इबादतों को मोहब्बत बना दिया

आँखें बुतों के साथ रहीं दिल ख़ुदा के साथ

मिरी तलब में तकल्लुफ़ भी इंकिसार भी था

वो नुक्ता-संज था सब मेरे हस्ब-ए-हाल दिया

पुस्तकें 5

Abjad

 

1982

Asas

 

1990

Be-Naam

 

1983

Be-Naam

 

1983

Patthar Ki Lakeer

 

1982

 

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