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शबनम रूमानी

1928 - 2009 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 16

शेर 2

अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे

क़ैद का सामाँ किया और उस को घर कहने लगे

तेरी ताबिश से रौशन हैं गुल भी और वीराने भी

क्या तू भी इस हँसती-गाती दुनिया का मज़दूर है चाँद?

 

पुस्तकें 11

Doosra Himala

 

2005

Harf-e-Nisbat

 

1984

Hyde Park

 

1990

Itr-e-Khayal

 

2017

Jazeerah

 

1961

Masnavi Sair-e-Karachi

 

2010

Moze Chilghoze

 

1991

Tohmat

 

1999

Shumara Number-019,020

 

वीडियो 6

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

शबनम रूमानी

Shabnam Rumani at a mushaira

शबनम रूमानी

आधा जीवन बीता आहें भरने में

शबनम रूमानी

तमाम उम्र की आवारगी पे भारी है

शबनम रूमानी

मैं ने किस शौक़ से इक उम्र ग़ज़ल-ख़्वानी की

शबनम रूमानी

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