Shoaib Bin Aziz's Photo'

शोएब बिन अज़ीज़

1950 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 3

 

शेर 3

अब उदास फिरते हो सर्दियों की शामों में

इस तरह तो होता है इस तरह के कामों में

दोस्ती का दावा क्या आशिक़ी से क्या मतलब

मैं तिरे फ़क़ीरों में मैं तिरे ग़ुलामों में

ग़ुंचा चटका था कहीं ख़ातिर-ए-बुलबुल के लिए

मैं ने ये जाना कि कुछ मुझ से कहा हो जैसे

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