ग़ज़ल 33

शेर 7

हम-सफ़र हो तो कोई अपना-सा

चाँद के साथ चलोगे कब तक

ये किस अज़ाब में छोड़ा है तू ने इस दिल को

सुकून याद में तेरी भूलने में क़रार

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कुछ ऐसा धुआँ है कि घुट्टी जाती हैं साँसें

इस रात के ब'अद आओगे शायद कभी याद

पुस्तकें 8

Iqbal Aur Aalmi Adab

 

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1987

कुल्लियात-ए-इक़बाल (उर्दू)

 

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Volume-001-003

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Urdu Mein Naat Goi

 

1990

 

चित्र शायरी 3

ये किस अज़ाब में छोड़ा है तू ने इस दिल को सुकून याद में तेरी न भूलने में क़रार

बुत बने राह तकोगे कब तक आस की आँच सहोगे कब तक सर उठा कर कभी देखो तो सही दिल की दुनिया में बसोगे कब तक जिस ने अपनी भी ख़बर ली न कभी तुम उसे याद करोगे कब तक हम-सफ़र हो तो कोई अपना-सा चाँद के साथ चलोगे कब तक कोई पत्ता है न बूटा है न गुल दश्त को बाग़ कहोगे कब तक हर तरफ़ आग बरसती है यहाँ किस तवक़्क़ो पे रहोगे कब तक आँधियाँ तेज़ हुई जाती हैं घर बुलाता है चलोगे कब तक कोई जा कर नहीं आता 'शोहरत' सूरत-ए-शम्अ घुलोगे कब तक

 

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