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सुलेमान ख़ुमार

1944 | बीजापुर, भारत

सुलेमान ख़ुमार

ग़ज़ल 21

अशआर 3

उम्र भर चल के भी पाई नहीं मंज़िल हम ने

कुछ समझ में नहीं आता ये सफ़र कैसा है

इक ख़ौफ़-ए-बे-पनाह है आँखों के आर-पार

तारीकियों में डूबता लम्हा है सामने

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मैं वाक़िफ़ हूँ तिरी चुप-गोइयों से

समझ लेता हूँ तेरी अन-कही भी

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पुस्तकें 2

 

ऑडियो 4

इस एक सोच में गुम हैं ख़याल जितने हैं

गुज़रते लम्हों के दिल में क्या है हमें पता है

दश्त में ये जाँ-फ़ज़ाँ मंज़र कहाँ से आ गए

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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