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सय्यद बासित हुसैन माहिर लखनवी

ग़ज़ल 1

 

शेर 6

दिल की हर बात कह गए आँसू

गिर के आँखों से रह गए आँसू

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तर्क-ए-उल्फ़त से मोहब्बत का लिखा मिट सका

वही अफ़्सुर्दगी-ए-शाम-ओ-सहर आज भी है

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फिरती है तो फिर जाए बदलती है तो बदले

दुनिया की नज़र है मिरी क़िस्मत तो नहीं है

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देख कर काली घटा अहल-ए-क़फ़स

और क्या करते तड़प कर रह गए

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हमें तो याद नहीं कोई लम्हा-ए-इशरत

कभी तुम्हीं ने किसी दिन हँसा दिया होगा

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