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ताबिश हमदून उस्मानी

1934 - 1992

शेर 2

यख़-बस्ता हो चुकी हैं उमीदों की बस्तियाँ

इन में तिरे बदन की हरारत कहाँ से लाएँ

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तिश्ना-लबी रहीन-ए-मय-ए-तल्ख़ है तो क्या

शीरीनी-ए-हयात की लज़्ज़त कहाँ से लाएँ

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