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ताबिश सिद्दीक़ी

1939

ताबिश सिद्दीक़ी

ग़ज़ल 2

 

शेर 2

ज़िंदा हूँ कि मरना मिरी क़िस्मत में लिखा है

हर रोज़ गुनाहों की सज़ा काट रहा हूँ

ये हाल मिरा मेरी मोहब्बत का सिला है

जो अपने ही दामन से बुझा हो वो दिया हूँ