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तालीफ़ हैदर

1987 | दिल्ली, भारत

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वो एक लम्हा जिसे तुम ने मुख़्तसर जाना

हम ऐसे लम्हे में इक दास्ताँ बनाते हैं

उसे कहाँ हमें क़ैदी बना के रखना था

हमीं को शौक़ नहीं था कभी रिहाई का

ख़ुदा वजूद में है आदमी के होने से

और आदमी का तसलसुल ख़ुदा से क़ाएम है

ख़िरद नहीं है यहाँ बस जुनून का सौदा

हम इस जुनून से आगे मकाँ बनाते हैं

इंकार भी करने का बहाना नहीं मिलता

इक़रार भी करने का मज़ा देख रहे हैं

ये शहर अपनी इसी हाव-हू से ज़िंदा है

तुम्हारी और मिरी गुफ़्तुगू से ज़िंदा है

इस तरह तुझे इश्क़ किया है कि ये दुनिया

हम को ही कहीं इश्क़ का हासिल बना दे

सफ़र ही बस कार-ए-ज़िंदगी है

अज़ाब क्या है सवाब क्या है

ये तेरा दिवाना रात गए मालूम नहीं क्यूँ पहरों तक

आँसू की लकीरों से कितने नक़्श-ए-जज़्बात बनाए है

किस की आँखों का नशा है कि मिरे होंटों को

इस क़दर तर नहीं कर सकती बला-नोशी भी

तो क्यूँ इस बार उस ने मेरे आगे सर झुकाया है

उसे तो आज भी मुश्किल था इंकार कर देना

अक्सर मिरे शेरों की सना करते रहे हैं

वो लोग जो ग़ालिब के तरफ़-दार नहीं हैं