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तनवीर अहमद अल्वी

1925 - 2013

तनवीर अहमद अल्वी

ग़ज़ल 17

अशआर 7

मिल भी जाता जो कहीं आब-ए-बक़ा क्या करते

ज़िंदगी ख़ुद भी थी जीने की सज़ा क्या करते

लम्हा-दर-लम्हा गुज़रता ही चला जाता है

वक़्त ख़ुशबू है बिखरता ही चला जाता है

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माँगने को तो यहाँ अपने सिवा कुछ भी था

लब पे आता भी अगर हर्फ़-ए-दुआ क्या करते

पलक झपकने में कुछ ख़्वाब टूट जाते हैं

जो बुत-शिकन है वही लम्हा बुत-तराश भी था

तेरी यादों की कहानी तो नहीं है 'तनवीर'

दिल पे दस्तक जो दिया करता है ख़ुशबू की तरह

पुस्तकें 48

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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