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तनवीर सामानी

ग़ज़ल 7

शेर 6

घरों में क़ैद हैं बस्ती के शोरफ़ा

सड़क पर हैं फ़सादी और गुंडे

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अपने काँधे पे लिए फिरती है एहसास का बोझ

ज़िंदगी क्या किसी मक़्तल की तमन्नाई है

क्यूँ 'तनवीर' फिर इज़हार की जुरअत कीजे

ख़ामुशी भी तो यहाँ बाइस-ए-रुस्वाई है