यशब तमन्ना

ग़ज़ल 19

शेर 4

करने को कुछ नहीं है नए साल में 'यशब'

क्यों ना किसी से तर्क-ए-मोहब्बत ही कीजिए

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पढ़ चुके हैं निसाब-ए-तंहाई

अब लिखेंगे किताब-ए-तंहाई

समझ सका उसे मैं क़ुसूर मेरा है

कि मेरे सामने तो वो खुली किताब रहा

हक़ीक़तों से मफ़र चाही थी 'यशब' मैं ने

पर अस्ल अस्ल रहा और ख़्वाब ख़्वाब रहा

पुस्तकें 1

किताब-ए-तनहाई

 

2011

 

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