ग़ालिब से माज़रत के साथ: ग़ालिब पर लिखे गए चुनिंदा हास्य लेख

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मिर्ज़ा नौशा और चौदहवीं

मिर्ज़ा ग़ालिब अपने दोस्त हातिम अली मेहर के नाम एक ख़त में लिखते हैं, “मुग़ल बच्चे भी अजीब होते हैं कि जिस पर मरते हैं उसको मार रखते हैं, मैंने भी ‎अपनी जवानी में एक सितम पेशा डोमनी को मार रखा था।” सन् बारह सौ चौंसठ हिज्री में मिर्ज़ा ग़ालिब चौसर की

सआदत हसन मंटो

ग़ालिब जदीद शु'अरा की एक मजलिस में

‎(दौर-ए-जदीद के शोअरा की एक मजलिस में मिर्ज़ा ग़ालिब का इंतज़ार किया जा रहा है। उस ‎मजलिस में तक़रीबन तमाम जलील-उल-क़द्र जदीद शोअरा तशरीफ़ फ़र्मा हैं। मसलन मीम नून ‎अरशद, हीरा जी, डाक्टर क़ुर्बान हुसैन ख़ालिस, मियां रफ़ीक़ अहमद ख़ूगर, राजा अह्द अली खान, ‎प्रोफ़ेसर

कन्हैया लाल कपूर

ग़ालिब फिर इस दुनिया में

जब मैं इस दुनिया में था तो मैंने बेचैन हो कर एक बार कहा था, मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यों रात-भर नहीं आती ‎ आज मौत की नींद फिर उचट गई। क्या नींद, क्या मौत, दोनों में किसी का एतबार ‎नहीं, जब ज़िंदा थे तो ज़िंदगी का रोना था और मौत की तमन्ना

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुझे हम वली समझते जो न बादा ख़्वार होता

  रावी: यादगार-ए-ग़ालिब में हाली लिखते हैं,‎ “मरने से कई बरस पहले चलना फिरना मौक़ूफ़ हो गया था। अक्सर औक़ात पलंग पर ‎पड़े रहते थे। ग़िज़ा कुछ ना रही थी। 1866 ई. में ख़्वाजा अज़ीज़ लखनवी लखनऊ से ‎कश्मीर जाते वक़्त रास्ते में ग़ालिब से मिले थे, मिर्ज़ा साहिब

आल-ए-अहमद सूरूर

ग़ालिब के दो सवाल

  आख़िर इस दर्द की दवा क्या है ‎ एक दिन मिर्ज़ा ग़ालिब ने मोमिन ख़ां मोमिन से पूछा, “हकीम साहिब, आख़िर इस दर्द की दवा क्या ‎‎है?” मोमिन ने जवाब में कहा, “मिर्ज़ा साहिब, अगर दर्द से आपका मतलब दाढ़ का दर्द है, तो उसकी ‎कोई ‎दवा नहीं, बेहतर होगा आप

कन्हैया लाल कपूर

ग़ालिब अपने कलाम के आइने में

‎“तन्क़ीद-ए-आलिया” का दौर दौरा है और तहक़ीक़-ओ-तदक़ीक़ की संगलाख़ ज़मीन में नए नए फूल ‎और पौदे उगा कर वीरानों को गुलज़ार बनाने की कोशिशें हो रही हैं, इस ज़िम्न में मुसन्निफ़ों और ‎शायरों की सवानिह हयात, उनके कलाम और तसानीफ़ से मुरत्तिब करने का शुग़ल आम हो चुका

हरी चंद अख़्तर

पूछते हैं वोह कि ग़ालिब कौन है

आज कल शहर में जिसे देखो, पूछता फिर रहा है कि ग़ालिब कौन है? उसकी वलदीयत, सुकूनत और पेशे के मुताल्लिक़ तफ़तीश हो रही है। हमने भी अपनी सी जुस्तजू की। टेलीफ़ोन डायरेक्टरी को खोला। उस में ग़ालिब आर्ट स्टूडियो तो था लेकिन ये लोग महरुख़ों के लिए मुसव्विरी सीखने

इब्न-ए-इंशा

तरक़्क़ी-पसंद ग़ालिब

पहला मंज़र  ‎(बाग़-ए-बहिश्त में मिर्ज़ा ग़ालिब का महल। मिर्ज़ा दीवानख़ाना में मस्नद पर बैठे एक परीज़ाद को ‎‎कुछ लिखवा रहे हैं, साग़र-ओ-मीना का शुग़ल जारी है। एक हूर साक़ी के फ़राइज़ अंजाम दे रही है।)  ‎(मुंशी हर गोपाल तफ्ता दाख़िल होते हैं)  तफ़्ता आदाब

कन्हैया लाल कपूर

नजात का तालिब, ग़ालिब

(चंद ख़ुतूत) (1) “लो मिर्ज़ा तफ़ता एक बात लतीफ़े की सुनो। कल हरकारा आया तो तुम्हारे ख़त के साथ एक ख़त करांची बंदर से मुंशी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का भी लाया जिसमें लिखा है कि हम तुम्हारी सदसाला बरसी मनाते हैं। जलसा होगा जिसमें तुम्हारी शायरी पर लोग मज़मून पढ़ेंगे।

इब्न-ए-इंशा

मिर्ज़ा ग़ालिब से इंटरव्यू

  मैं: क्या ये वाक़िया है कि आपके वालिद मोहतरम अबदुल्लाह बेग आपकी तरह अह्ल-ए-क़लम या अह्ल-ए-ख़राबात में से नहीं बल्कि अह्ल-ए-सैफ़ में से थे और उनका इंतक़ाल भी एक मुहिम में बंदूक़ की गोली खाकर हुआ था। नीज़ आपका सिलसिला-ए-नसब शाहान-ए-तूराँ अफ़सरासियाब और

नरेश कुमार शाद

ग़ालिब की महफ़िल

‎(मुक़ाम दिल्ली 1856 ईसवी)  रावी: 1850 ई. तक दिल्ली और लखनऊ की महफ़िलों पर बहार थी, हर तरफ़ शे’र-ओ-‎सुख़न का चर्चा था। इसमें कोई शक नहीं कि सियासी तौर पर आज़ाद के अलफ़ाज़ में ‎दरख़्त-ए-इक़बाल को दीमक लग चुकी थी। लेकिन अभी बर्ग-ओ-बार की शगुफ़्तगी और ‎ताज़गी

सय्यद आबिद अली आबिद

मिर्ज़ा ग़ालिब का खत पंडित नेहरू के नाम

जान-ए-ग़ालिब, बैन-उल-अक़वामी सुलह के तालिब, मियाँ जवाहर लाल, ख़ुश फ़िक्र-ओ-ख़ुश-ख़िसाल जुग-जुग जियो, ता-क़यामत आब-ए-हयात पियो। सुनो साहब! इमाम-उल-हिंद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आए हैं और अपने हमराह दो नुस्खे़ दीवान-ए-ग़ालिब के लाए हैं, जो मुझे अभी मौसूल

फ़ुर्क़त काकोरवी

ग़ालिब जन्नत में

ग़ालिब की मौत  पस-मंज़र: एक सेह-दरा दालान है जिसके सामने एक बड़ा सेहन है। दालान के दरूँ ‎में अंदरूनी जानिब पर्दे आधी मेहराब तक बंधे हुए हैं। दालान के वस्त में एक पलंग है ‎जिसका सिराहना शुमाल की सिम्त है, पलंग पर गद्दा बिछा हुआ है और सफ़ेद चादर ‎चारों तरफ़

सिराज अहमद अलवी

ग़ालिब के घर में एक शाम

तारीख़: शब-ए-क़द्र और दीवाली का दिन। क़ब्ल ग़दर दिल्ली में, 1800 ई.  वक़्त: माबैन अस्र-ओ-मग़रिब। साया ढल रहा है।  किरदार: 1-मीरज़ा ग़ालिब  ‎2- बेगम ग़ालिब  ‎ (एक मर्दाना कमरा। दीवारों पर ताज़ा सफ़ेदी फिरी हुई, बोसीदा ईरानी क़ालीन जिस पर ‎चीते की खाल

मोहम्मद दीन तासीर

ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्जे़

बाग़-ए-बहिश्त में मिर्ज़ा ग़ालिब अपने महफ़िल में एक पुरतकल्लुफ़ मस्नद पर बैठे दीवान-ए-ग़ालिब ‎की वर्क़ गरदानी कर रहे हैं। अचानक बाहर से नारों की आवाज़ आती है। ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्जे़... ‎ग़ालिब के... उड़ेंगे पुर्जे़... मिर्ज़ा घबरा कर लाहौल पढ़ते हैं और फ़रमाते

कन्हैया लाल कपूर

आए है बे-कसी-ए-इश्क़ पे रोना ग़ालिब

इस गर्दिश-ए-अय्याम ने किसी और को बिगाड़ा हो या न बिगाड़ा हो मगर इश्क़ को अ'र्श से फ़र्श पर ‎वो पटख़नी दी है कि अगर उस दौर में आँसुओं पर इतना शदीद पहरा न होता तो यक़ीनन उसकी ‎बे-कसी पर रोना आ जाता। यूँ दुहाई देते तो फिर भी लोग नज़र आ ही जाते हैं। फिरते

शफ़ीक़ा फ़रहत

ग़ालिब दावर-ए-महशर के सामने

  सूर की मुहीब और हैबतनाक आवाज़ से दिल बैठा जा रहा था। मुर्दों की दुनिया में एक हंगामा बरपा था। सब के सब एक दूसरे को धक्का दे कर आगे पीछे हटने की कोशिश कर रहे थे। “क़यामत आ गई! क़यामत आ गई!” का रूह फ़र्सा शोर इस रेले में भी आगे बढ़ा। क़ब्रों से जल्दी जल्दी

मुहिय्य-उल-हक़ फ़ारूकी

ग़ालिब और शरीक-ए-ग़ालिब

इधर कई महीनों से मकान की तलाश में शह्र के बहुत से हिस्सों और गोशों की ख़ाक छानने और कई महल्लों की आब-ओ-हवा को नमूने के तौर पर चखने का इत्तफ़ाक़ हुआ तो पता चला कि जिस तरह हर गली के लिए कम से कम एक कम तौल पंसारी, एक घर का शेर कुत्ता, एक लड़ाका सास, एक बद-ज़बान

वजाहत अली संदैलवी

नतीजा ग़ालिब शनासी का

मिर्ज़ा ग़ालिब जितने बड़े शायर थे उतने ही बल्कि उससे कुछ ज़्यादा ही दानिशमंद और दूर अंदेश ‎आदमी थे। उन्हें मालूम था कि एक वक़्त ऐसा आएगा जब उनके वतन में उनका कलाम सुख़न ‎फ़ह्मों के हाथों से निकल कर हम जैसे तरफ़दारों के हाथ पड़ जाएगा, इसलिए उन्होंने ब-कमाल-ए-‎होशियारी

यूसूफ़ नाज़िम

असद-उल-अल्लाह खाँ तमाम हुआ

ग़ालिब की ज़िंदगी अपने आग़ाज़-ओ-अंजाम और दरमियानी वाक़िआत की तर्तीब-ओ-‎इर्तिक़ा के लिहाज़ से एक ड्रामाई कैफ़ियत रखती है। दुनियाए शे’र में तो मिर्ज़ा ग़ालिब ‎ख़ल्लाक़-ए-मआनी और फ़नकार थे ही, लेकिन उनकी शख़्सी ज़िंदगी के मुरक़्क़ा को भी ‎रंग और रोशनी और साये की आमेज़िश

हमीद अहमद खाँ

ग़ालिब क़ैद में

तफ़्ता: क़िबला कल आप मुफ़्ती सदर उद्दीन आज़ुर्दा के मुशायरे में शरीक न हुए।  ग़ालिब: एक तो दर्द कमर, दूसरे बारिश, शिरकत न कर सका। मुफ़्ती साहिब को ‎माज़रत नामा भेज दिया था। क्यों मुशायरा कैसा रहा?  तफ़्ता: बड़ा कामयाब रहा, लाला मुकुन्दीलाल भी तो वहां मौजूद

मुज़फ़्फ़र हुसैन शमीम

ग़ालिब एंड गोएटे

मुझसे रिवायत किया कामरेड बारी अलीग ने और उन्होंने सुना अपने दोस्त मिर्ज़ा काज़िम से और ‎मिर्ज़ा काज़िम ने सुनाई आप-बीती और अब आप मुझसे सुनिए “मिर्ज़ा बीती” मेरे अलफ़ाज़ में और ‎इसका सवाब पहुंचाइए ग़ालिब और गोएटे की अर्वाह को और दुआ कीजिए मेरे हक़ में। वल्लाह

हाजी लक़ लक़

ग़ालिब के साथ आराफ़ में

  अलिफ़: आदाब अर्ज़ करता हूँ क़िबला।  ग़ालिब: जीते रहो, जीते रहो... आलम-ए-ख़ाकी से आरहे शायद... कैसे आना हुआ?  अलिफ़: बस शौक़-ए-ज़ियारत खींच लाया, फ़रमाईए, इस आलम-ए-लाहूत में कैसे बसर ‎हो रही है?  ग़ालिब: अजी, यहां धरा क्या है?  अलिफ़: अच्छा,

हिज़्ब-उल-अल्लाह

मिर्ज़ा ग़ालिब हॉस्टल में

  (जे़ल में मिर्ज़ा ग़ालिब के तीन ग़ैर मतबूआ मकातीब हैं जो मुस्लिम यूनीवर्सिटी के हॉस्टल एस एम ईस्ट से लिखे गए हैं। उन ख़ुतूत की तवारीख़ ना-मालूम हैं।) 1 - दोस्त के नाम मेरी जान किन औहाम में गिरफ़्तार है। जहाँ से बी.ए कामयाब किया है वहीं से एम.ए.भी

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

ग़ालिब और तेलिन

  मीर मेह्दी: मिर्ज़ा साहिब भी बहुत बरहम हैं। फ़रमाते हैं कि इन ना-अह्लों को अब मैं हरगिज़ अपना कलाम नहीं सुनाऊँगा, जो शायराना निकात-ओ-रुमूज़ से वाक़िफ़ हैं न इल्मी इस्ते’दाद रखते हैं। ग़ज़ल में सिर्फ़ मुआमलाबंदी और चोंचला चाहते हैं। नवाब नय्यरः उनका

हमीदा सुल्तान अहमद