मंटो की 20 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

एक आर्टिस्ट अपनी पूरी

ज़िंदगी में बेशुमार कृतियों की रचना करता है उनमें से कुछ विशेष कृतियां ही उसकी पहचान बनती हैं। उसी तरह मंटो की कुछ कहानियां ऐसी हैं जो अपने विषय और प्रस्तुति की वजह से हमेशा ज़ेहन में मौजूद रहती हैं। हम यहाँ ऐसी ही 20 चुनिन्दा कहानियां आपके लिए पेश रहे हैं जिन्हें हम मंटो के क़लम से निकला शाहकार कह सकते हैं।

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ठंडा गोश्त

यह एक सिख नौजवान के नामर्द हो जाने की कहानी है। विभाजन के दौरान हुए दंगों में ईश्वर सिंह गाँव के मुस्लिम मोहल्ले में हुई लूट में शामिल था। वहाँ उसे एक खू़बसूरत लड़की मिलती है। अपनी हवस बुझाने के लिए जैसे ही वह उस पर झुकता है तो उसे पता चलता है कि लड़की तो बिल्कुल ठंडी है। उसे वहीं छोड़कर वह होटल में अपनी दाश्ता कुलवंत के पास आता है, लेकिन लाख कोशिश के बाद भी खु़द को गरम नहीं कर पाता। इससे गुस्साई कुलवंत उसे ख़ंजर घोंप देती है।

सआदत हसन मंटो

खोल दो

अमृतसर से स्शपेशल ट्रेन दोपहर दो बजे को चली और आठ घंटों के बाद मुग़लपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। मुतअद्दिद ज़ख़्मी हुए और कुछ इधर उधर भटक गए। सुबह दस बजे कैंप की ठंडी ज़मीन पर जब सिराजुद्दीन ने आँखें खोलीं और अपने चारों तरफ़ मर्दों, औरतों

सआदत हसन मंटो

काली शलवार

एक पेशा करने वाली औरत सुल्ताना की आत्मा की पीड़ा और उसके अंत: के सन्नाटे को इस कहानी में बयान किया गया है। पहले ख़ुदा-बख़्श उसे प्यार का झांसा देकर अंबाला से दिल्ली लेकर आता है और उसके बाद शंकर मात्र काली शलवार के बदले उसके साथ जिस तरह का फ़रेब करता है इससे अंदाज़ा होता है कि मर्द की नज़र में औरत की हैसियत केवल एक खिलौने की सी है। उसके दुख-दर्द और इसके नारीत्व की उसे कोई परवाह नहीं।

सआदत हसन मंटो

आख़िरी सल्यूट

हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद कश्मीर के लिए दोनों मुल्कों में होने वाली पहली जंग के दृश्यों को प्रस्तुत किया गया है कि किस तरह दोनों देश की सेना भावनात्मक रूप से एक दूसरे के अनुरूप हैं लेकिन अपने-अपने देश के संविधान और क़ानून के पाबंद होने की वजह से एक दूसरे पर हमला करने पर विवश हैं। वही लोग जो विश्व-युद्ध में एकजुट हो कर लड़े थे वो उस वक़्त अलग-अलग देश में विभाजित हो कर एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो गए।

सआदत हसन मंटो

हतक

"प्यार के दो बोल के लिए तरसती हुई एक ऐसी बे-बस और बे-सहारा वेश्या की कहानी है जो अपमान की पराकाष्ठा पर पहुंच कर आत्मज्ञान से दो-चार होती है। सौगंधी एक वेश्या है, रात के दो बजे जब एक सेठ ग्राहक उसे ठुकरा कर चला जाता है तो उसके अंदर की औरत जागती है और फिर एक विचित्र प्रकार की मनोदशा में वो प्यार का ढोंग रचाने वाले माधव लाल को भी धुतकार कर भगा देती है और अपने ख़ारिश-ज़दा कुत्ते को पहलू में लिटा कर सो जाती है।"

सआदत हसन मंटो

टेटवाल का कुत्ता

कहानी में मुख्य रूप से हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों के बीच की धार्मिक घृणा और पूर्वाग्रह को दर्शाया गया है। कुत्ता जो कि एक बेजान जानवर है, हिन्दुस्तानी फ़ौज के सिपाही केवल मनोरंजन के लिए उस कुत्ते का कोई नाम रखते हैं और वह नाम लिख कर उसके गले में लटका देते हैं। जब वो कुत्ता पाकिस्तान की सरहद की तरफ़ आता है तो पाकिस्तानी सैनिक उसे कोई कोड-वर्ड समझ कर सतर्क हो जाते हैं। दोनों तरफ़ के सैनिकों की ग़लत-फ़हमी के कारण उस कुत्ते पर गोली चला देते हैं।

सआदत हसन मंटो

धुआँ

यह कहानी वयस्कता के मनोविज्ञान पर आधारित है। एक ऐसे बच्चे की भावनाओं को चित्रित किया गया है जो कामोत्तेजना की दहलीज़ पर क़दम रख रहा है और वह अपने अंदर होने वाले बदलाव को महसूस तो कर रहा है मगर समझ नहीं पा रहा है। त्रास्दी ये है कि उसकी भावनाओं को सही दिशा देने वाला कोई नहीं है।  

सआदत हसन मंटो

बारिश

"यह एक नौजवान के ना-मुकम्मल इश्क़ की दास्तान है। तनवीर अपनी कोठी से बारिश में नहाती हुई दो लड़कियों को देखता है। उनमें से एक लड़की पर मुग्ध हो जाता है। एक दिन वो लड़की उससे कार में लिफ़्ट माँगती है और तनवीर को ऐसा महसूस होता है कि उसे अपनी मंज़िल मिल गई है लेकिन बहुत जल्द उसे मालूम हो जाता है कि वो वेश्या है और तनवीर उदास हो जाता है।"

सआदत हसन मंटो

मोज़ेल

औरत के त्याग, बलिदान और मुहब्बत व ममता के इर्द-गिर्द बुनी गई यह है। मोज़ील एक आज़ाद-मिज़ाज यहूदी लड़की है जो पाबंद वज़ा सरदार त्रिलोचन का ख़ूब मज़ाक़ उड़ाती है लेकिन वक़्त पड़ने पर वो दंगा-ग्रस्त इलाक़े में जा कर त्रिलोचन की मंगेतर को दंगाइयों के चंगुल से आज़ाद कराती है और ख़ुद दंगे का शिकार हो जाती है।

सआदत हसन मंटो

यज़ीद

करीम दादा एक ठंडे दिमाग़ का आदमी है जिसने तक़सीम के वक़्त फ़साद की तबाहियों को देखा था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान जंग के तानाज़ुर में यह अफ़वाह उड़ती है कि हिन्दुस्तान वाले पाकिस्तान की तरफ़ आने वाले दरिया का पानी बंद कर रहे हैं। इसी बीच उसके यहाँ एक बच्चे का जन्म होता है जिसका नाम वह यज़ीद रखता है और कहता है कि उस यज़ीद ने दरिया बंद किया था, यह खोलेगा।

सआदत हसन मंटो

बाबू गोपीनाथ

वेश्याओं और उनके परिवेश को दर्शाने वाली इस कहानी में मंटो ने उन पात्रों के बाहरी और आन्तरिक स्वरूप को उजागर करने की कोशिश की है जिनकी वजह से ये माहौल पनपता है। लेकिन इस अँधेरे में भी मंटो इंसानियत और त्याग की हल्की सी किरन ढूंढ लेता है। बाबू गोपी नाथ एक रईस आदमी है जो ज़ीनत को 'अपने पैरों पर खड़ा करने' के लिए तरह तरह के जतन करता है और आख़िर में जब उसकी शादी हो जाती है तो वो बहुत ख़ुश होता है और एक अभिभावक की भूमिका अदा करता है।

सआदत हसन मंटो

गुरमुख सिंह की वसीयत

सरदार गुरूमुख सिंह को अब्द-उल-हई जज ने एक झूठे मुक़द्दमे से नजात दिलाई थी। उसी एहसान के बदले में गुरूमुख सिंह ईद के दिन जज साहब के यहाँ सेवइयाँ लेकर आता था। एक साल जब दंगों ने पूरे शहर में आतंक फैला रखा था, जज अबदुलहई फ़ालिज की वजह से मृत्यु शैया पर थे और उनकी जवान बेटी और छोटा बेटा हैरान परेशान थे कि इसी ख़ौफ़ व परेशानी के आलम में सरदार गुरूमुख सिंह का बेटा सेवइयाँ लेकर आया और उसने बताया कि उसके पिता जी का देहांत हो गया है और उन्होंने जज साहब के यहाँ सेवइयाँ पहुँचाने की वसीयत की थी। गुरूमुख सिंह का बेटा जब वापस जाने लगा तो बलवाइयों ने रास्ते में उससे पूछा कि अपना काम कर आए, उसने कहा कि हाँ, अब जो तुम्हारी मर्ज़ी हो वो करो।

सआदत हसन मंटो

मेरा नाम राधा है

"ये कहानी औरत की इच्छा शक्ति को पेश करती है। राज किशोर के रवय्ये और बनावटी व्यक्तित्व से नीलम परिचित है, इसीलिए फ़िल्म स्टूडियो के हर फ़र्द की ज़बान से तारीफ़ सुनने के बावजूद वो उससे प्रभावित नहीं होती। एक रोज़ सख़्त लहजे में बहन कहने से भी मना कर देती है और फिर आख़िरकार रक्षा बंधन के दिन आक्रोशित हो कर उसे बिल्लियों की तरह नोच डालती है।"

सआदत हसन मंटो

जानकी

जानकी एक ज़िंदा और जीवंत पात्र है जो पूना से बम्बई फ़िल्म में काम करने आती है। उसके अंदर ममता और ख़ुलूस का ठाठें मारता समुंदर है। अज़ीज़, सईद और नरायन, जिस व्यक्ति के भी नज़दीक होती है उसके साथ जिस्मानी ख़ुलूस बरतने में कोई तकल्लुफ़ महसूस नहीं करती। उसकी नफ़्सियाती पेचीदगियाँ कुछ इस तरह की हैं कि जिस वक़्त वह एक शख़्स से जिस्मानी रिश्तों में जुड़ती है, ठीक उसी वक़्त उसे दूसरे की बीमारी का भी ख़याल सताता रहता है। जिन्सी मैलानात का तज्ज़िया करती हुई यह एक उम्दा कहानी है।

सआदत हसन मंटो

साहिब-ए-करामात

साहिब-ए-करामात सीधे सादे व्यक्तियों को मज़हब का लिबादा ओढ़ कर धोखा देने और मूर्ख बनाने की कहानी है। एक चालाक आदमी पीर बन कर मौजू का शोषण करता है। शराब के नशे में धुत्त उस पीर को करामाती बुज़ुर्ग समझ कर मौजू की बेटी और बीवी उसकी हवस का शिकार होती हैं। मौजू की अज्ञानता की हद यह है कि उस तथाकथित पीर की कृत्रिम दाढ़ी तकिया के नीचे मिलने के बाद भी उसकी चालबाज़ी को समझने के बजाय उसे चमत्कार समझता है।

सआदत हसन मंटो

ख़ुशिया

यह एक आदमी की मर्दानगी को चुनौती देने की कहानी है। एक वेश्या जो अपने दलाल को मात्र गाहक उपलब्ध कराने वाला एक हानिरहित साधन समझती है और उसके सामने नग्न रहने में भी कोई बुराई महसूस नहीं करती, वही दलाल एक दिन जोश में आकर ख़ुद गाहक बन बैठता है।

सआदत हसन मंटो

कबूतरों वाला साईं

"कहानी इंसानी आस्थाओं और मिथ्या लांछनों पर आधारित है। माई जीवाँ के नीम पागल बेटे को चमत्कारी समझना, सुंदर जाट डाकू जिसका वुजूद तक संदिग्ध है उससे गाँव वालों का खौफ़ज़दा रहना, नीती के ग़ायब होने को सुंदर जाट से वाबस्ता करना, ऐसी परिकल्पनाएं हैं जिनकी सत्यता का कोई तर्क नहीं।"

सआदत हसन मंटो

ख़ाली बोतलें, ख़ाली डिब्बे

ये हैरत मुझे अब भी है कि ख़ास तौर पर ख़ाली बोतलों और डिब्बों से मुजर्रद मर्दों को इतनी दिलचस्पी क्यों होती है? मुजर्रद मर्दों से मेरी मुराद उन मर्दों से है जिनको आमतौर पर शादी से कोई दिलचस्पी नहीं होती। यूं तो इस क़िस्म के मर्द उमूमन सनकी और अजीब-ओ-ग़रीब

सआदत हसन मंटो

फ़ूभा बाई

यह एक औरत के निष्ठा, त्याग और बलिदान की कहानी है। फ़ोभा बाई बंबई में रह कर पेशा करती थी, हर महीने जयपुर अपने बेटे को दो सौ रुपये भेजती थी और हर तीन महीने पर उससे मिलने जाती थी। बद-क़िस्मती से वो बेटा मर जाता है और फ़ोभा बाई का पूरा वजूद तबाह हो जाता है।

सआदत हसन मंटो

नया क़ानून

कहानी लखनऊ के उस समय की दास्तान बयान करती है, जब अंग्रेज़ सरकार ने एक नया क़ानून बना कर उसे अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया था। नगर के नवाब और वज़ीर-ए-आज़म कोशिश करने के बाद भी अंग्रेज़ सरकार को इस क़दम को उठाने से रोक नहीं सके थे।

क़ाज़ी अबदुस्सत्तार
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