वेश्याओं पर मंटो की 20 प्रसिद्ध कहानियाँ

समाज में तवाइफ़ (वेश्या)

का ज़िक्र इस नापसंदीदगी और घृणा से किया जाता है जैसे उसका वजूद ही सड़ांध भरा हो। लेकिन मंटो ने अपनी कहानियों में तवाइफ़ को एक औरत के रूप में देखा है, एक ऐसी औरत के रूप में जिसके पास स्वाभिमान है और वो भी अपनी ज़ात को क़द्र के लायक़ समझती है, चाहे जरूरतों ने उसे कितने भी भयानक अंधेरे में ढकेल दिया हो। यहाँ मंटो की ऐसी ही 20 कहानियां प्रस्तुत हैं जो तवाइफ़ों की ज़िंदगी का दर्द भरा सच आपके सामने लाती हैं।

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काली शलवार

एक पेशा करने वाली औरत सुल्ताना की आत्मा की पीड़ा और उसके अंत: के सन्नाटे को इस कहानी में बयान किया गया है। पहले ख़ुदा-बख़्श उसे प्यार का झांसा देकर अंबाला से दिल्ली लेकर आता है और उसके बाद शंकर मात्र काली शलवार के बदले उसके साथ जिस तरह का फ़रेब करता है इससे अंदाज़ा होता है कि मर्द की नज़र में औरत की हैसियत केवल एक खिलौने की सी है। उसके दुख-दर्द और इसके नारीत्व की उसे कोई परवाह नहीं।

सआदत हसन मंटो

1919 की एक बात

आज़ादी के संघर्ष में अंग्रेज़ की गोली से शहीद होने वाले एक वेश्या के बेटे की कहानी है। तुफ़ैल उर्फ़ थैला कंजर की दो बहनें भी वेश्या थीं। तुफ़ैल एक अंग्रेज़ को मौत के घाट उतार कर ख़ुद शहीद हो गया था। अंग्रेज़ों ने बदला लेने के उद्देश्य से उसकी दोनों बहनों को बुला कर मुजरा कराया और उनकी इज़्ज़त को तार-तार किया।

सआदत हसन मंटो

हतक

"प्यार के दो बोल के लिए तरसती हुई एक ऐसी बे-बस और बे-सहारा वेश्या की कहानी है जो अपमान की पराकाष्ठा पर पहुंच कर आत्मज्ञान से दो-चार होती है। सौगंधी एक वेश्या है, रात के दो बजे जब एक सेठ ग्राहक उसे ठुकरा कर चला जाता है तो उसके अंदर की औरत जागती है और फिर एक विचित्र प्रकार की मनोदशा में वो प्यार का ढोंग रचाने वाले माधव लाल को भी धुतकार कर भगा देती है और अपने ख़ारिश-ज़दा कुत्ते को पहलू में लिटा कर सो जाती है।"

सआदत हसन मंटो

झुमके

सुनार की उंगलियां झुमकों को ब्रश से पॉलिश कर रही हैं। झुमके चमकने लगते हैं, सुनार के पास ही एक आदमी बैठा है, झुमकों की चमक देख कर उसकी आँखें तमतमा उठती हैं। बड़ी बेताबी से वो अपने हाथ उन झुमकों की तरफ़ बढ़ाता है और सुनार कहता है, “बस अब दे दो मुझे।” सुनार

सआदत हसन मंटो

बर्मी लड़की

ज्ञान की शूटिंग थी इसलिए किफ़ायत जल्दी सो गया। फ़्लैट में और कोई नहीं था, बीवी-बच्चे रावलपिंडी चले गए थे। हमसायों से उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। यूं भी बंबई में लोगों को अपने हमसायों से कोई सरोकार नहीं होता। किफ़ायत ने अकेले ब्रांडी के चार पैग पिए। खाना

सआदत हसन मंटो

जानकी

जानकी एक ज़िंदा और जीवंत पात्र है जो पूना से बम्बई फ़िल्म में काम करने आती है। उसके अंदर ममता और ख़ुलूस का ठाठें मारता समुंदर है। अज़ीज़, सईद और नरायन, जिस व्यक्ति के भी नज़दीक होती है उसके साथ जिस्मानी ख़ुलूस बरतने में कोई तकल्लुफ़ महसूस नहीं करती। उसकी नफ़्सियाती पेचीदगियाँ कुछ इस तरह की हैं कि जिस वक़्त वह एक शख़्स से जिस्मानी रिश्तों में जुड़ती है, ठीक उसी वक़्त उसे दूसरे की बीमारी का भी ख़याल सताता रहता है। जिन्सी मैलानात का तज्ज़िया करती हुई यह एक उम्दा कहानी है।

सआदत हसन मंटो

हारता चला गया

एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे जीतने से ज़्यादा हारने में मज़ा आता है। बैंक की नौकरी छोड़ने के बाद फ़िल्मी दुनिया में उसने बे-हिसाब दौलत कमाई थी। यहाँ उसने इतनी दौलत कमाई कि वह जितना ख़र्च करता उससे ज़्यादा कमा लेता। एक रोज़ वह जुआ खेलने जा रहा था कि उसे इमारत के नीचे ग्राहकों को इंतज़ार करती एक वेश्या मिली। उसने उसे दस रूपये रोज़ देने का वादा किया, ताकि वह अपना धंधा बंद कर सके। कुछ दिनों बाद उसने देखा कि वह वेश्या फिर खिड़की पर बैठी ग्राहक का इंतेज़ार कर रही। पूछने पर उसने ऐसा जवाब दिया कि वे व्यक्ति ला-जवाब हो कर ख़ामोश हो गया।

सआदत हसन मंटो

सौ कैंडल पॉवर का बल्ब

"इस कहानी में इंसान की स्वाभाविक और भावनात्मक पहलूओं को गिरफ़्त में लिया गया है जिनके तहत वो कर्म करते हैं। कहानी की केन्द्रीय पात्र एक वेश्या है जिसे इस बात से कोई सरोकार नहीं कि वो किस के साथ रात गुज़ारने जा रही है और उसे कितना मुआवज़ा मिलेगा बल्कि वो दलाल के इशारे पर कर्म करने और किसी तरह काम ख़त्म करने के बाद अपनी नींद पूरी करना चाहती है। आख़िर-कार तंग आकर अंजाम की परवाह किए बिना वो दलाल का ख़ून कर देती है और गहरी नींद सो जाती है।"

सआदत हसन मंटो

क़ादिरा क़साई

अपने ज़माने की एक ख़ूबसूरत और मशहूर वेश्या की कहानी। उसके कोठे पर बहुत से लोग आया करते थे। सभी उससे मोहब्बत का इज़हार किया करते थे। उनमें एक ग़रीब शख़्स भी उससे मोहब्बत का दावा करता था। वेश्या ने उसकी मोहब्बत को ठुकरा दिया। वेश्या के यहाँ एक बेटी हुई। वह भी बहुत ख़ूबसूरत थी। जिन दिनों उसकी बेटी की नथ उतरने वाली थी उन्हीं दिनों देश का विभाजन हो गया। इसमें वेश्या मारी गई और उसकी बेटी पाकिस्तान चली गई। यहाँ भी उसने अपना कोठा जमाया। जल्द ही उसके कई चाहने वाले निकल आए। वह जिस शख़्स को अपना दिल दे बैठी थी वह एक क़ादिरा कसाई था, जिसे उसकी मोहब्बत की कोई ज़रूरत नहीं थी।

सआदत हसन मंटो

सरकण्डों के पीछे

"औरत के अन्तर्विरोधों को बयान करती हुई यह कहानी है। इसमें एक तरफ़ नवाब है जो इतनी सादा और सरल है कि जब सरदार उससे पेशा कराती है तो वो सोचती है कि जवान होने के बाद हर औरत का यही काम होता है। दूसरी तरफ़ शाहीना है जो नवाब का क़त्ल करके उसका गोश्त पका डालती है, सिर्फ़ इस आधार पर कि हैबत ख़ान ने उससे बेवफ़ाई की थी और नवाब के यहाँ आने जाने लगा था"

सआदत हसन मंटो

महमूदा

औरत जब बुरी होती है वह इसीलिए बुरी नहीं होती कि वह बुरी है। बल्कि वह इसलिए बुरी होती है क्योंकि मर्द उसे बुरा बनाते हैं। बड़ी-बड़ी आँखों वाली महमूदा एक बहुत खू़बसूरत लड़की थी। उसकी शादी भी बड़ी धूमधाम से हुई थी लेकिन अपने शौहर के नकारापन की वजह से वह इस धँधे में उतर जाती है।

सआदत हसन मंटो

सेराज

यह एक ऐसी नौजवान वेश्या की कहानी है, जो किसी भी ग्राहक को ख़ुद को हाथ नहीं लगाने देती। हालाँकि जब उसका दलाल उसका सौदा किसी से करता है, तो वह ख़ुशी-ख़ुशी उसके साथ चली जाती है, लेकिन जैसे ही ग्राहक उसे कहीं हाथ लगाता है कि अचानक वह उससे झगड़ने लगती है। दलाल उसकी इस हरकत से बहुत परेशान रहता है, पर वह उसे ख़ुद से अलग भी नहीं कर पाता है, क्योंकि वह उससे मोहब्बत करने लगा है। एक दिन वह दलाल को लेकर लाहौर चली जाती है। वहाँ वह उस नौजवान से मिलती है, जो उसे घर से भगाकर एक सराय में अकेला छोड़ गया था।

सआदत हसन मंटो

ख़ुशिया

यह एक आदमी की मर्दानगी को चुनौती देने की कहानी है। एक वेश्या जो अपने दलाल को मात्र गाहक उपलब्ध कराने वाला एक हानिरहित साधन समझती है और उसके सामने नग्न रहने में भी कोई बुराई महसूस नहीं करती, वही दलाल एक दिन जोश में आकर ख़ुद गाहक बन बैठता है।

सआदत हसन मंटो

डरपोक

यह कहानी एक ऐसे शख़्स की है जो औरत की शदीद ख़्वाहिश होने के चलते रंडीख़ाने पर जाता है। उसने अभी तक की अपनी ज़िंदगी में किसी औरत को छुआ तक नहीं था। न ही उसने अभी तक किसी से इज़हार-ए-मोहब्बत किया था। ऐसा नहीं था कि उसे कभी कोई मौक़ा न मिला हो। मगर उसे जब भी कोई मौक़ा मिला वह किसी अनजाने ख़ौफ़़ के चलते उस पर अमल न कर सका। मगर पिछले कुछ दिनों से उसे औरत की बेहद ख़्वाहिश हो रही थी। इसलिए वह उस जगह तक चला आया था। रंडीख़ाना उससे एक गली दूर था, पर पता नहीं किस डर के चलते उस गली को पार नहीं कर पा रहा था। अंधेरे में तन्हा खड़ा हुआ वह आस-पास के माहौल को देखता है और अपने डर पर क़ाबू पाने की कोशिश करता है। मगर इस से पहले कि वह डर को अपने क़ाबू में करे, डर उसी पर हावी हो गया और वह वहाँ से ऐसे ही ख़ाली हाथ लौट गया।

सआदत हसन मंटो

मोमबत्ती के आँसू

यह एक ग़ुर्बत की ज़िंदगी गुज़ारती वेश्या की कहानी है। उसके घर में अंधेरा है। ताक़ में रखी मोमबत्ती मोम को पिघलाती हुई जल रही है। उसकी छोटी बच्ची मोतियों का हार माँगती है तो वह फ़र्श पर जमे मोम को धागे में पिरो कर माला बनाकर उसके गले में पहना देती है। रात में उसका ग्राहक आता है। उससे अलग होने पर वह थक जाती है, तभी उसे अपनी बच्ची का ध्यान आता है और वह उसके छोटे पलंग के पास जाकर उसे अपनी बाँहों में भर लेती है।

सआदत हसन मंटो

हामिद का बच्चा

हामिद नाम के एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो मौज-मस्ती के लिए एक वेश्या के पास जाता रहता है। पर जल्दी ही उसे पता चलता है कि वह वेश्या उससे गर्भवती हो गई है। इस ख़बर को सुनकर हामिद डर जाता है। वह वेश्या को उसके गाँव छोड़ आता है। उसके बाद वह योजना बनाता है कि जैसे ही बच्चा पैदा होगा वह उसे दफ़न कर देगा। मगर बच्चे की पैदाइश के बाद जब वह उसे दफ़न करने गया तो उसने एक नज़र बच्चे को देखा। बच्चे की शक्ल हू-ब-हू उस वेश्या के दलाल से मिलती थी।

सआदत हसन मंटो

सोनोरल

बुशरा ने जब तीसरी मर्तबा ख़्वाब-आवर दवा सोनोरल की तीन टिकियां खा कर ख़ुदकुशी की कोशिश की तो मैं सोचने लगा कि आख़िर ये सिलसिला क्या है। अगर मरना ही है तो संख्या मौजूद है, अफ़ीम है। इन सुमूम के इलावा और भी ज़हर हैं जो बड़ी आसानी से दस्तयाब हैं। हर बार सोनोरल,

सआदत हसन मंटो

पहचान

"तीन दोस्त अपने सौन्दर्य सम्बंधी आनंद की संतुष्टी के लिए कुछ देर के लिए एक नफ़ासत-पसंद लड़की चाहते हैं। एक ताँगे वाला उनको कई जगहों पर ले जाता है, हर जगह से वो बहाना करके निकल लेते हैं। आख़िर में वो उनको एक कमसिन, ग़रीब और भद्दी सी लड़की के पास ले जाता है जहाँ से तीनों दोस्त उठकर भाग खड़े होते हैं। ताँगे वाला अपना किराया वसूल करते वक़्त उनसे कहता है, बाबू जी आपको कुछ पहचान नहीं... ऐसी करारी लौंडिया तो शहर भर में नहीं मिलेगी आपको।"

सआदत हसन मंटो

फ़ूभा बाई

यह एक औरत के निष्ठा, त्याग और बलिदान की कहानी है। फ़ोभा बाई बंबई में रह कर पेशा करती थी, हर महीने जयपुर अपने बेटे को दो सौ रुपये भेजती थी और हर तीन महीने पर उससे मिलने जाती थी। बद-क़िस्मती से वो बेटा मर जाता है और फ़ोभा बाई का पूरा वजूद तबाह हो जाता है।

सआदत हसन मंटो