हेंसन रेहानी
ग़ज़ल 6
अशआर 5
तोड़ कर निकले क़फ़स तो गुम थी राह-ए-आशियाँ
वो अमल तदबीर का था ये अमल तक़दीर का
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ग़म की तकमील का सामान हुआ है पैदा
लाइक़-ए-फ़ख़्र मिरी बे-सर-ओ-सामानी है
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ज़ुल्मत में भी रसाई-ए-मंज़िल का है यक़ीं
मश'अल दिखा रहे हैं तिरे नक़्श-ए-पा मुझे
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'रेहानी' उन को देख के महव-ए-ख़िराम-ए-नाज़
हर गाम पर बहार का धोका हुआ मुझे
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हर ज़र्रा है जमाल की दुनिया लिए हुए
इंसाँ अगर हो दीदा-ए-बीना लिए हुए
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