कुलदीप कुमार
ग़ज़ल 120
अशआर 7
दरख़्त करते नहीं इस लिए उमीद-ए-वफ़ा
वो जानते हैं परिंदों के पर निकलते हैं
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मौसम-ए-याद यूँ उजलत में न वारे जाएँ
हम वो लम्हे हैं जो फ़ुर्सत से गुज़ारे जाएँ
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मैं हार जाता हूँ उन दो उदास आँखों से
मुझे सफ़र का इरादा बदलना पड़ता है
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तुम्हारा क्या गया गर थोड़ा सा क़रार गया
ये दुख तो मेरा है ऐ दिल मिरा तो यार गया
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मैं उस के 'इश्क़ नहीं हौसले का क़ाइल हूँ
सियाह शब था मैं फिर भी मुझे गुज़ार गया
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