परवीन फ़ना सय्यद के शेर
मेरी आँखों में उतरने वाले
डूब जाना तिरी आदत तो नहीं
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तेरी पहचान के लाखों अंदाज़
सर झुकाना ही इबादत तो नहीं
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खुल के रो लूँ तो ज़रा जी सँभले
मुस्कुराना ही मसर्रत तो नहीं
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हर सम्त सुकूत बोलता है
ये कौन से जुर्म की सज़ा है
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जहान-ए-रंग-ओ-बू पर मिटने वालो
ये दुनिया मौज है साहिल नहीं है
नशात-अंगेज़ नग़्मे क्या सुनाएँ
तबीअ'त इस तरफ़ माइल नहीं है
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टैग : संगीत
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