Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
Rasheed Lakhnavi's Photo'

रशीद लखनवी

1847 - 1918 | लखनऊ, भारत

मर्सिया, ग़ज़ल और रुबाई के प्रतिष्ठित शायर । मीर अनीस के नवासे

मर्सिया, ग़ज़ल और रुबाई के प्रतिष्ठित शायर । मीर अनीस के नवासे

रशीद लखनवी के शेर

862
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

ज़िंदगी कहते हैं किस को मौत किस का नाम है

मेहरबानी आप की न-मेहरबानी आप की

हँस हँस के कह रहा है जलाना सवाब है

ज़ालिम ये मेरा दिल है चराग़-ए-हरम नहीं

तुम ने एहसान किया है कि नमक छिड़का है

अब मुझे ज़ख़्म-ए-जिगर और मज़ा देते हैं

हमारी ज़िंदगी-ओ-मौत की हो तुम रौनक़

चराग़-ए-बज़्म भी हो और चराग़-ए-फ़न भी हो

दोनों आँखें दिल जिगर हैं इश्क़ होने में शरीक

ये तो सब अच्छे रहेंगे मुझ पर इल्ज़ाम आएगा

देखिए लाज़िम-ओ-मलज़ूम इसे कहते हैं

दिल है दाग़ों के लिए दाग़ मिरे दल के लिए

गए थे हज़रत-ए-ज़ाहिद तो ज़र्द था चेहरा

शराब-ख़ाने से निकले तो सुर्ख़-रू निकले

हुआ है सख़्त मुश्किल दफ़न होना तेरे वहशी का

जहाँ पर क़ब्र खोदी जाती है पत्थर निकलते हैं

इंतिज़ार आप का ऐसा है कि दम कहता है

निगह-ए-शौक़ हूँ आँखों से निकल जाऊँगा

गुल-अंदाम ये है फस्ल-ए-जवानी का उरूज

हुस्न का रंग टपकने को है रुख़्सारों से

अपनी वहशत से है शिकवा दूसरे से क्या गिला

हम से जब बैठा जाए कू-ए-जानाँ क्या करे

क़ैद की मुद्दत बढ़ी छुटने की जब तदबीर की

रोज़ बदली जाती हैं कड़ियाँ मिरी ज़ंजीर की

नहीं है जिस में तेरा इश्क़ वो दिल है तबाही में

वो कश्ती डूब जाएगी जिस में ना-ख़ुदा होगा

दिल है शौक़-ए-वस्ल में मुज़्तर नज़र मुश्ताक़-ए-दीद

जो है मशग़ूल अपनी अपनी सई-ए-ला-हासिल में है

बुतों के दिल में हमारी कुछ अब हुई है जगह

ख़ुदा ने रहम किया वर्ना मर गए होते

सभों की गई पीरी जो तुम जवान हुए

ज़मीं का दिल हुआ मिट्टी ख़म आसमान हुए

सिए जाते हैं कफ़न आप के दीवानों के

तार दामन के हैं टुकड़े हैं गरेबानों के

मा'शूक़ कौन सा है हो दिल में जिस की याद

इस मुख़्तसर से बाग़ में किस गुल की बू नहीं

रास आए तुम को मुल्क-ए-इश्क़ की आब-ओ-हवा

आशिक़ो हर-वक़्त शग़्ल-ए-आह-ओ-ज़ारी चाहिए

कभी मदफ़ून हुए थे जिस जगह पर कुश्ता-ए-अबरू

अभी तक इस ज़मीं से सैकड़ों ख़ंजर निकलते हैं

सज़ा हर एक को देने लगी हया उन की

कि चाक हो गई लिपटी जहाँ क़बा इन की

वो गेसू बढ़ते जाते हैं बलाएँ होती हैं नाज़िल

क़दम तक गए जब हश्र आलम में बपा होगा

हमेशा बे-दिली की कीजिए क्यूँकर दिलदारी

होना पास दिल का है निशानी एक दिलबर की

ख़ुदा जाने ये गर्दिश का तरीक़ा कब निकाला है

जिसे कहते हैं गर्दूं इक मिरे पाँव का छाला है

जो मेरी चश्म के पर्दे शरीक हो जाते

कमाल-ए-दामन-ए-अब्र-ए-बहार बढ़ जाता

Recitation

बोलिए