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रउफ़ रज़ा

1956 - 2016 | दिल्ली, भारत

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर

प्रमुख उत्तर-आधुनिक शायर

रउफ़ रज़ा के शेर

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वो ये कहते हैं सदा हो तो तुम्हारे जैसी

इस का मतलब तो यही है कि पुकारे जाओ

वो जो इक शख़्स तुम्हें याद किया करता था

आज मसरूफ़ बहुत है उसे तुम याद करो

यूँही हँसते हुए छोड़ेंगे ग़ज़ल की महफ़िल

एक आँसू से ज़ियादा कोई रोने का नहीं

सारी ख़ुशी हमारी आँखों से छन रही है

कुछ देर तुम ने गेसू लहरा दिए तो क्या है

जो भी कुछ अच्छा बुरा होना है जल्दी हो जाए

शहर जागे या मिरी नींद ही गहरी हो जाए

कहाँ गए वो शफ़ीक़ लम्हे

मैं जिन को जी कर बड़ा हुआ हूँ

अब इसी बात पे हैरान हुआ बैठा हूँ

क्यूँ किसी बात पे हैरान नहीं होता मैं

वो शख़्स था ही कुछ ऐसा हँसाता रहता था

मुझे भी सोग के 'आलम में मुस्कुराना पड़ा

रफ़्ता रफ़्ता लोग 'आदी हो गए

रात को दिन की तरह बरता गया

हाए वो शख़्स जो मायूस मिरे घर से गया

अपनी तन्हाइयाँ रखने के लिए आया था

कुछ नहीं अगली मुलाक़ात की घबराहट है

उस के जाने से परेशान नहीं होता मैं

क़लम की नोक पे रक्खे हुए चराग़ हैं हम

हवा चले तो हमारे लिए दु'आ करना

उलझन बनी हुई है ज़ख़्मों की ताज़ा-कारी

हर रोज़ इक मसीहा बीमार हो रहा है

वो तो बच्चों की पतंगों ने उसे घेर लिया

वर्ना चुपके से निकल जाती बहार आई हुई

हमारे पास तुम्हारे सिवा था कुछ भी

हज़ार चाहतें रक्खी हुई थीं मेले में

किस से पूछें कि हमें दश्त में करना क्या है

क्या किया जाता है बे-वक़्त बहार आने पर

किसी भी हाल में उस से जुदा नहीं होना

बिगाड़ता हूँ तबी'अत अगर सँभलती है

मैं शोर हूँ तेरी ख़ामुशी का

तमाम घर में मचा हुआ हूँ

जो दर-ब-दर हैं वही दर-ब-दर नहीं हैं 'रज़ा'

मकान वाले भी ख़ाली मकाँ में बैठे हैं

बस ये होता है कि सुर-ताल बदल जाती है

रक़्स रोका नहीं जाता है बहार आने पर

ये हुस्न-ए-ज़ात भी कुछ चीज़ है अगर समझो

वक़ार और बढ़ा है सफ़ेद बालों से

इस मुलाक़ात को ज़ंजीर की सूरत कर दे

ख़ुद से मिलता हूँ तो आपे में नहीं रहता हूँ

इतनी रंजिश में अकेला नहीं हो सकता मैं

आज की रात भी अपना नहीं हो सकता मैं

ये पेड़ कौन सी दुनिया की बात करते हैं

हमें तो साया भी अपना ख़रीद लाना पड़ा

इस तरह लोगों के ईमान बिगड़ जाते हैं

जिस तरह उस ने मुझे साहिब-ए-ईमान किया

इस दर्जा ख़मोशी के गुनह-गार होते

काश छलक जाती वही आख़री चाय

इस सफ़र में मुझे पानी की ज़रूरत पड़े

जहाँ आराम करूँ तुम मिरे सीने में मिलो

मैं रोज़-ओ-शब का तसव्वुर बदलना चाहता हूँ

लगी हुई है मिरी ख़्वाब बुनने वालों से

रौशनी दिखाई दे चाप तो सुनाई दे

इक किवाड़ 'आदतन रखता हूँ खुला हुआ

मैं जी उठा मैं 'मर गया मैं फिर से जी उठा

ये सारी वारदात ज़रा देर की है बस

'रज़ा' हमारी इन आँखों के पास कुछ भी नहीं

बस एक रात है जो बार-बार ढलती है

हाथ जोड़े हुए फिर सामने फ़ाक़ा आया

आज फिर आदमी होने से मुकरना है मुझे

अब ये पथराई हुई आँखें लिए फिरते रहो

मैं ने कब तुम से कहा था मुझे इतना देखो

सारे नाकाम-ए-तमन्ना मिरे दिल तक जाएँ

आज वो काम करेंगे कि जो होने का नहीं

उसी में सौ रम्ज़ सूझते हैं

जो बात कहने से रह गई है

मिरे ख़याल में वो दिलबरी की मंज़िल थी

तुम्हें भुलाना पड़ा और तुम्हें बताना पड़ा

इस नग़मगी का थोड़ा गुनह-गार मैं भी हूँ

मुझ से भी इस जहान में हलचल रही है दोस्त

वो भी अब कौन सा बाक़ी है मिरी ग़ज़लों में

मैं भी अब दूसरी दुनिया में कहीं रहता हूँ

क्या भूल पड़ गई है रस्ते सँभालने में

ख़ुद को भी याद रखना दुश्वार हो रहा है

हम को वैसे भी कोई काम नहीं आता है

और ये काम हक़ीक़त को फ़साना करना

मेरे चेहरे से 'अयाँ कुछ भी नहीं

ये कमी है तो कमी है मुझ में

यक़ीं के जोश में अपना क़सीदा लिख डाला

मैं ख़ुद-शनासी को समझा ख़ुदा-शनासी है

मेरे सीने से निकालो मिरी बुनियाद की जान

इतनी आसानी से वीरान नहीं होता मैं

काश आवाज़ को तस्वीर किया जा सकता

एक ही लय में हुए झील का पानी और मैं

तुम कोई और तस्वीर रवाना करना

मेरी पलकों की तो 'आदत है पुराना करना

हम को आदाब-ए-तकल्लुफ़ भी कहाँ आते हैं

हम तो पहली ही मुलाक़ात में खुल जाएँगे

मिरी आँखों में जाना तो इक मा'मूल है लेकिन

मोहब्बत ज़ोर करती है तो वो साँसों में आता है

मज़ा तो शाम की महफ़िल के इंतिज़ार में है

सहर में कुछ नहीं ख़्वाब-ए-सहर में कुछ भी नहीं

जाने कितने नसीबों के साथ ढलती है

ये शब जो मेरी ज़रूरत से कम निकलती है

ख़ुदा से मिलने की आरज़ू थी वो बंदगी थी

ख़ुदा को महसूस कर रहा हूँ ये शा'इरी है

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