क़तआ'त
गज़ल में कभी कभी बीच में दो-तीन ऐसे अशआर लाये जाते हैं जिन में कोई बात निरंतरता के साथ बयान की जाती है। ये चंद अशआर ग़ज़ल के शेरों से अलग होते हैं, इस लिए इन्हें क़तअ कहते हैं। जिस ग़ज़ल में क़तअ हो उसे क़तअ-बंद ग़जल कहा जाता है।
युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि शायर, जो अपने मुन्फ़रिद अंदाज़ की शाइरी के लिए जाने जाते हैं