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मिर्ज़ा यगाना ने अपने दौर के प्रचलित तौर-तरीक़ों और समाजी रवैयों से बग़ावत की, जिसकी भारी क़ीमत उन्होंने एक 'आउटसाइडर' की हैसियत से तन्हाई और रुसवाई की शक्ल में चुकाई।
उर्दू और पंजाबी ने एक दूसरे को बाहरी तौर पर प्रभावित नहीं किया है, बल्कि पंजाब की एक ही रूह ने अपने जज़्बाती इज़हार के लिए पंजाबी और फ़िक्री (वैचारिक) इज़हार के लिए उर्दू को चुना है।
मर्सिया और ड्रामा ज़ाहिरी तौर पर दो अलग विधाएँ हैं, लेकिन गहरे अध्ययन से उनके बीच संवाद, टकराव और कशमकश जैसी हैरत-अंगेज़ तकनीकी समानताएँ सामने आती हैं।
मीर तक़ी मीर की तक़लीद (नक़्ल) करने में बाद के शायरों (जैसे ज़ौक़, फ़िराक़ और नासिर काज़मी) की नाकामी और ग़ालिब की वह तख़्लीक़ी हिकमत-ए-अमली (रचनात्मक रणनीति) जिसने उन्हें मीर का सच्चा वारिस बनाया।
अल्लामा शिबली नोमानी ने ब्रज भाषा के सनाए-ओ-बदाए (अलंकार) की अरबी और फ़ारसी की सनअतों से तुलना करते हुए हिंदी शायरी की ख़ूबसूरती और ख़यालों की नज़ाकत को उजागर किया है।
ज़ेहनी बनावट की समानता के बा-वुजूद, मीर की शायरी एक विशाल और हलचल भरे शहर की तरह है, जबकि ग़ालिब का कलाम एक सजा-धजा और तिलिस्मी दीवान-ख़ाना है।
उर्दू शायरी में रोज़मर्रा की चीज़ों के इस्तेमाल को लेकर मीर तक़ी मीर, नज़ीर अकबराबादी और अकबर इलाहाबादी के अंदाज़ का तुलनात्मक जायज़ा।
अठारहवीं सदी के उर्दू शायर मीर तक़ी मीर और उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी शायर चार्ल्स बोदलेयर की बिल्लियों पर लिखी गई नज़्मों का हैरत-अंगेज़ तुलनात्मक अध्ययन।