उर्दू ग़ज़ल में रवादारी (सहिष्णुता), रस्मों का त्याग और इंसानियत का सबक़
सूफ़ीवाद और साझी तहज़ीब के असर में उर्दू ग़ज़ल ने हमेशा मज़हबी तंग-नज़री और ज़ाहिरी रस्मों की निंदा की, और रवादारी (सहिष्णुता) और आफ़ाक़ी (सार्वभौमिक) मुहब्बत का सबक़ दिया।
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सूफ़ीवाद और साझी तहज़ीब के असर में उर्दू ग़ज़ल ने हमेशा मज़हबी तंग-नज़री और ज़ाहिरी रस्मों की निंदा की, और रवादारी (सहिष्णुता) और आफ़ाक़ी (सार्वभौमिक) मुहब्बत का सबक़ दिया।
उर्दू और हिंदी की बुनियाद एक होने के बा-वुजूद, विकास के सफ़र से गुज़रकर ये दोनों दो अलग और आज़ाद ज़बानें बन चुकी हैं, इसलिए इनकी लिपि एक होना ज़रूरी नहीं।
सर सैयद अहमद ख़ान की अदबी तहरीक सिर्फ़ अख़लाक़ी (नैतिक) सुधार तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पश्चिमी इल्म हासिल करने और इस्लाम के सुनहरे दौर की सादगी को अपनाने का एक संतुलित और हक़ीक़त-पसंद संगम थी।
इक़बाल ने उर्दू अदब को रूमानियत के सपनों वाले माहौल और पश्चिम के दबदबे से निकाल कर एक नया, ताक़तवर और फ़िक्री गहराई पर आधारित उसलूब (शैली) दिया जिसने अदब की धारा मोड़ दी।
मीर अनीस के मर्सियों (शोकगीतों) में अरब किरदारों को हिंदुस्तानी तहज़ीब के साँचे में ढालना कोई ऐतिहासिक ख़ामी (कमी) नहीं, बल्कि एक महान काव्य और रचनात्मक ज़रूरत थी।
मुशायरे की शुरुआत, अरबी दौर-ए-जाहिलियत (इस्लाम से पहले का ज़माना) की सभाओं से लेकर ईरान की जागीरदाराना सभ्यता और फिर हिंदुस्तान के मुग़ल दरबारों तक के तहज़ीबी सफ़र का एक तफ़सीली जायज़ा।
फ़ारसी के ज़वाल (पतन) के बाद उर्दू मुशायरों का उरूज (उदय), दिल्ली और लखनऊ के अमीरों की सरपरस्ती, और मुशायरे के उन आदाब और नियमों का बयान जिन्होंने ज़बान को तो संवारा लेकिन तख़्लीक़ी (रचनात्मक) आज़ादी को सीमित कर दिया।
यह मज़मून इस नफ़्सियाती (मनोवैज्ञानिक) बहस का जायज़ा लेता है कि क्या रचनात्मक काम लेखक की शख़्सियत को सँवारता है और उसके दुखों का इलाज है, या महज़ एक तकलीफ़-देह रद्द-ए-अमल (प्रतिक्रिया) है।
इस्तिआरे (रूपक) का इस्तेमाल महज़ (सिर्फ़) एक साहित्यिक तरीक़ा नहीं, बल्कि यह अहंकार के ख़ोल से निकल कर कायनात (सृष्टि) की रंगा-रंगी, विरोधाभासों और फैलाव को अपने अंदर जज़्ब (आत्मसात) करने का एक सूफ़ीयाना और आशिक़ाना अमल (प्रक्रिया) है।
मुसव्विरी (चित्रकारी) या शायरी के किसी भी शाहकार का लुत्फ़ उठाने के लिए एक 'मुनासिब फ़ासले' की ज़रूरत होती है, जिसके बिना हुस्न का अस्ली एहसास नामुमकिन है।
कोई भी फ़न्नी-तख़्लीक़ (कलात्मक रचना) अपने पाठक या नाज़िर (दर्शक) के बग़ैर अधूरी है। पाठक महज़ तमाशाई नहीं होता, बल्कि वह अपने एहसासात से फ़न-पारे (कलाकृति) के ख़ाली शिगाफ़ों (दरारों) को भर कर उसे मुकम्मल करता है।
हसरत मोहानी ने ग़ज़ल की रिवायती इश्क़िया अलामतों (प्रतीकों) और इशारों का इस्तेमाल करते हुए अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ अपने बाग़ी और सियासी जज़्बात का बहुत ख़ूबसूरती से इज़हार किया।
मीर तक़ी मीर के यहाँ 'गुल' (फूल) और 'चमन' (बाग़) की अलामतें (प्रतीक) ख़ुद-रौ (अपने आप उगने वाली) फ़ितरत (प्रकृति) की नहीं, बल्कि उभरती हुई शहरी तहज़ीब और मुग़लों के नफ़ासत-पसंद (सुरुचिपूर्ण) 'पाईं बाग़' की अक्कास (दर्शाने वाली) हैं।
पिछली एक सदी के उर्दू अदब पर पंजाब वालों की गहरी छाप है, जिसके बिना उर्दू शायरी और नस्र (गद्य) का दामन बेहद ग़रीब और ख़ाली नज़र आता है।
उर्दू और पंजाबी ने एक दूसरे को बाहरी तौर पर प्रभावित नहीं किया है, बल्कि पंजाब की एक ही रूह ने अपने जज़्बाती इज़हार के लिए पंजाबी और फ़िक्री (वैचारिक) इज़हार के लिए उर्दू को चुना है।
उर्दू रस्म-उल-ख़त (लिपि) पूरी तरह से हिंदुस्तानी आवाज़ों के अनुकूल है। इसमें हिंदी की हकार (महाप्राण) और माकूसी (मूर्धन्य) आवाज़ों के लिए सोलह अलामतों (चिह्नों) का इज़ाफ़ा इसे अरबी और फ़ारसी से अलग और देसी बनाता है।
इंतज़ार हुसैन ने पश्चिमी कहानी की बनावट को रद्द करते हुए उर्दू फ़िक्शन को दास्तान, हिकायत और कथा के पूर्वी अंदाज़ से वाक़िफ़ कराया, जिससे कहानी में सुनने-सुनाने का लुत्फ़ दोबारा पैदा हुआ।
आर्ट का मक़सद सस्ती-जज़्बातियत (भावुकता) या हवस उभारना नहीं बल्कि जज़्बात का कैथार्सिस करके इंसान को तवाज़ुन (संतुलन), सुकून और जमालियाती-तहय्युर (सौंदर्यपरक आश्चर्य) देना है।
इंतज़ार हुसैन ने अपने दूसरे दौर में इंसान के रूहानी पतन, हवस और जिबिल्ली (मूल प्रवृत्ति के) दबाव को तमसीलों (रूपकों) और पौराणिक प्रतीकों के ज़रिए पेश किया है, जहाँ इंसान बंदर, कुत्ते या मक्खी में तब्दील हो जाता है।
अपने आख़िरी दौर में इंतज़ार हुसैन ने बौद्ध जातकों, हिंदू देवमाला और सामी (सेमिटिक) रिवायतों (परंपराओं) को मिलाकर इंसानी बक़ा (अस्तित्व) और कायनाती (ब्रह्मांडीय) सच्चाइयों को एक नई आफ़ाक़ी (सार्वभौमिक) दिशा दी।