aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "dar"
'दर्द' हर-चंद मैं ज़ाहिर में तो हूँ मोर-ए-ज़ईफ़ज़ोर निस्बत है वले मुझ को 'सुलैमान' के साथ
न पूछ ऐ 'दर्द' मेरी वुसअ'त-ए-शौक़हुदूद-ए-ग़म बढ़ाना चाहता हूँ
मंसूर-ओ-दार का जो सुना मैं ने वाक़िआ'मुझ को तज़ाद-ए-जुर्म-ओ-सज़ा याद आ गया
जब वली ने किया इंकार महल जाने सेउन के दर पर भी तो सुल्तान का जाना ठहरा
दिन को न घर से जाइए लगता है डर मुझेइस पारा-ए-सहाब को सूरज न देख ले
नम भी होना नहीं दरिया से गुज़र जाना भीतू ने ये शर्त भी क्या सोच के ऐ यार रखी
दयार-ए-दिल से गुज़र जिस घड़ी भी हो 'दिलदार'मिले न फूल तो अश्कों के हार रख देना
बाहर ये क़दम निकलें तो खुलेज़ंजीर मदद करती है कि दर
हम पस-ए-दार सीख आते हैंजो सर-ए-दार करना होता है
दाद देना तो इक अलग फ़न हैशे'र हम भी कहाँ समझते हैं
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