aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "hosh"
वो नहीं है तो ग़मिस्तान-ए-तख़य्युल की क़सम'होश' अफ़्सुर्दा कहानी है तिरे शहर की रात
उन के सीनों में दहकते हुए अंगारे हैंतुम ने देखे हैं जो हँसते हुए इंसाँ ऐ 'होश'
ज़िंदगी इस लिए शायद है पशेमाँ ऐ 'होश'कि फ़क़त मौत है सरमाया-ए-इंसाँ ऐ 'होश'
ग़म-ए-दिल सुनाता हूँ मैं 'होश' उन कोमगर कोई देखे मिरी बे-क़रारी
'होश' करते न अगर ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ क्या करतेपुर्सिश-ए-ग़म का सलीक़ा भी तो यारों में न था
हम ने सौंपी है उन्हें अपनी हिफ़ाज़त ऐ 'होश'जिन को आया नहीं ख़ुद अपनी निगहबाँ होना
सुन कर कि 'होश' ने भी किया तर्क-ए-आरज़ूकोहराम इक मचा हुआ शहर-ए-वफ़ा में है
तीरगी के पर्दे में मर्ग-ए-तीरगी है 'होश'जब उठा हिजाब-ए-शब मेहर ज़ौ-फ़िशाँ देखा
मजबूर-ए-यक़ीन-ए-वा'दा हूँ मैंऐ 'होश' वो आएँ या न आएँ
हम जिन्हें 'होश' तजाहुल से ख़ता समझे थेनावक-ए-नाज़ वो सब दिल में तराज़ू निकले
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