aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूरसर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है
किया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा-ख़्वारों की अंजुमन मेंतो पीर-ए-मय-ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह फट है ख़ार होगा
तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंदअब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी
ज़ाहिद ने कुछ इस अंदाज़ से पी साक़ी की निगाहें पड़ने लगींमय-कश यही अब तक समझे थे शाइस्ता दौर-ए-जाम नहीं
ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मय-ख़ानेनिगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतिक़ाम लिया
मय-परस्ताँ ख़ुम-ए-मय मुँह से लगाए ही बनेएक दिन गर न हुआ बज़्म में साक़ी न सही
बात साक़ी की न टाली जाएगीकर के तौबा तोड़ डाली जाएगी
सर-ए-मय-कदा तिश्नगी की वो क़स्मेंवो साक़ी से बातें बनाने की रातें
ये जाम ये सुबू ये तसव्वुर की चाँदनीसाक़ी कहाँ मुदाम! ज़रा आँख तो मिला
हुई न आम जहाँ में कभी हुकूमत-ए-इश्क़सबब ये है कि मोहब्बत ज़माना-साज़ नहीं
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