aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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जो मैं सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदातिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
सुना है हमें वो भुलाने लगे हैंतो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हेकि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता
इस शहर के बादल तिरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैंये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते
पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारीआँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते
है बरपा हर गली में शोर-ए-नग़्मामिरी फ़रियाद मारी जा रही है
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैंकिसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं
हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैंतो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं
सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतनतो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं
इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता हैबाद में सैकड़ों आज़ार से लग जाते हैं
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