aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू परचमन और भी आशियाँ और भी हैं
मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहींजो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरियान कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
होता है निहाँ गर्द में सहरा मिरे होतेघिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मिरे आगे
जुज़ नाम नहीं सूरत-ए-आलम मुझे मंज़ूरजुज़ वहम नहीं हस्ती-ए-अशिया मिरे आगे
पा-ए-कूबाँ कोई ज़िंदाँ में नया है मजनूँआती आवाज़-ए-सलासिल कभी ऐसी तो न थी
चारा-ए-दिल सिवाए सब्र नहींसो तुम्हारे सिवा नहीं होता
दिलकश ऐसा कहाँ है दुश्मन-ए-जाँमुद्दई है प मुद्दआ है इश्क़
वो वक़्त न आए कि दिल-ए-ज़ार भी सोचेइस शहर में तन्हा कोई हम सा है कि तुम हो
किसी तरह जो न उस बुत ने ए'तिबार कियामिरी वफ़ा ने मुझे ख़ूब शर्मसार किया
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