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नज़्म
शिकवा
चाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल हों
जागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल हों
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
क़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेरा
ग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
कनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कश
पस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तराना-ए-मिल्ली
'इक़बाल' का तराना बाँग-ए-दरा है गोया
होता है जादा-पैमा फिर कारवाँ हमारा
अल्लामा इक़बाल
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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ऐ रहीन-ए-ख़ाना तू ने वो समाँ देखा नहीं
गूँजती है जब फ़ज़ा-ए-दश्त में बाँग-ए-रहील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल
नौहा-ए-ग़म ही सही शोर-ए-शहादत ही सही
सूर-ए-महशर ही सही बाँग-ए-क़यामत ही सही
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
यहाँ पे 'मेराज' तेरे लफ़्ज़ों की आबरू क्या
ये लोग बाँग-ए-दरा की क़ीमत लगा रहे हैं
मेराज फ़ैज़ाबादी
नज़्म
नामा-ए-जानाँ
दर-ओ-दीवार-ए-ख़राबात वही हैं लेकिन
न कहीं क़ुलक़ुल-ए-मीना है न गुल-बाँग-ए-सुबू
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
मिस्ल-ए-कलीम हो अगर मा'रका आज़मा कोई
अब भी दरख़्त-ए-तूर से आती है बाँग-ए-ला-तख़फ़
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
राहिल हूँ मुसलमान ब-साद-नारा-ए-तकबीर
ये क़ाफ़िला ये बाँग-ए-दरा मेरे लिए है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
रश्क-ए-हम-तरही ओ दर्द-ए-असर-ए-बांग-ए-हज़ीं
नाला-ए-मुर्ग़-ए-सहर तेग़-ए-दो-दम है हम को
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
एक है जब शोर-ए-जह्ल ओ बाँग-ए-हिकमत का मआल
दिल हलाक-ए-ज़ौक़-ए-गुलबाँग-ए-परेशाँ क्यूँ न हो
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
करूँ फ़रियाद रो रो यार को जब याद कर 'आजिज़'
दम इस्राफ़ील का लोहू हो बाँग-ए-सूर से टपके
