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ग़ज़ल
ये बार-ए-ग़म-ए-इश्क़ समाया है कि 'नासिख़'
है कोह से दह-चंद गिरानी मिरे दिल की
इमाम बख़्श नासिख़
रेख़्ती
नए धानों की सी खेती की तरह से 'इंशा'
डह-डही और हरी हूँ तो भला तुझ को क्या
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
आरास्ता जिन के लिए गुलज़ार ओ चमन थे
जो नाज़ुकी में दाग़ दह-ए-बर्ग-ए-समन थे
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
खड़े चुप हो देखते क्या मिरे दिल उजड़ गए को
वो गुनह तो कह दो जिस से ये दह-ए-ख़राब उल्टा
