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नज़्म
दो इश्क़
उम्मीद कि लौ जागा ग़म-ए-दिल का नसीबा
लो शौक़ की तरसी हुई शब हो गई आख़िर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जिन अश्कों की फीकी लौ को हम बे-कार समझते थे
उन अश्कों से कितना रौशन इक तारीक मकान हुआ
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
बुझते हुए दिए की लौ और भीगी आँख के बीच
कोई तो है जो ख़्वाबों की निगरानी करता है

