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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
''चौकी आँगन में बिछी वास्ती दूल्हा के लिए''
मक्के मदीने के पाक मुसल्ले पयम्बर घर नवासे
जौन एलिया
ग़ज़ल
मन की दुनिया मन की दुनिया सोज़ ओ मस्ती जज़्ब ओ शौक़
तन की दुनिया तन की दुनिया सूद ओ सौदा मक्र ओ फ़न
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आदमी-नामा
शैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोर
और हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमी
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
मक्र की चालों से बाज़ी ले गया सरमाया-दार
इंतिहा-ए-सादगी से खा गया मज़दूर मात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
हवस की धूम-धाम है, नगर नगर, गली गली
क़दम क़दम खुले हुए हैं मक्र-ओ-फ़न के मदरसे
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
निदा आई कि आशोब-ए-क़यामत से ये क्या कम है
गिरफ़्ता चीनियाँ एहराम ओ मक्की ख़ुफ़्ता दर बतहा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नौ-जवान से
न देख ज़ोहद की तू इस्मत-ए-गुनह-आलूद
गुनह में फ़ितरत-ए-इस्मत-मआब पैदा कर



