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नज़्म
होली
जुदा न हम से हो ऐ ख़ुश-जमाल होली में
कि यार फिरते हैं यारों के ताल होली में
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
होली
जब आई होली रंग-भरी सौ नाज़-ओ-अदा से मटक मटक
और घूँघट के पट खोल दिए वो रूप दिखला चमक चमक
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
क्या दिया है आप ने जुज़ मुझ को इक तस्वीर के
हाँ उसी से कहती हूँ हमदम तू मुझ से बात कर
ऋतु सिंह राजपूत रीत
ग़ज़ल
ज़रा ठोकर लगे तो ख़ुद-कुशी की बात करता है
बशर इस दौर का कुछ उलझनों से कितना डरता है
ऋतु सिंह राजपूत रीत
ग़ज़ल
उसे मत पूछना उलझा रहा जो सिर्फ़ फूलों में
पता सब रास्तों का काँटों के बिस्मिल से मिलता है



