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नज़्म
मैं उसे वाक़िफ़-ए-उल्फ़त न करूँ
रूह को उस की असीर-ए-ग़म-ए-उल्फ़त न करूँ
उस को रुस्वा न करूँ वक़्फ़-ए-मुसीबत न करूँ
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
ये क्या कि इक जहाँ को करो वक़्फ़-ए-इज़्तिराब
ये क्या कि एक दिल को शकेबा न कर सको
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
ग़ज़ल
ज़हीर देहलवी
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ग़ज़ल
तिरे वास्ते है ये वक़्फ़ सर रहे ता-अबद तिरा संग-ए-दर
कोई सज्दा-रेज़ न हो सके तो न हो मिरी ही जबीं सही
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
बहुत घुटन है
वो फ़लसफ़े जो हर इक आस्ताँ के दुश्मन थे
अमल में आए तो ख़ुद वक़्फ़-ए-आस्ताँ निकले
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
दर-ख़याल आबाद सौदा-ए-सर-ए-मिज़्गान-ए-दोस्त
सद-रग-ए-जाँ जादा-आसा वक़्फ़-ए-नश्तर-ज़ार है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो
चाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है
मिरा सर रंज-ए-बालीं है मिरा तन बार-ए-बिस्तर है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
हुस्न हो जाएगा जब औरों का वक़्फ़-ए-ख़ास-ओ-आम
दीदनी होगा तिरे ख़ल्वत-कदे का एहतिमाम
जोश मलीहाबादी
नअत
हैं वक़्फ़ जान-ओ-दिल मिरे इस काम के लिए
पढ़िए दरूद रहबर-ए-इस्लाम के लिए



