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नज़्म
मरहूम और महरूम
हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के
मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते
ज़ुबैर अली ताबिश
ग़ज़ल
और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती
जब भी उस के पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर
जाँ निसार अख़्तर
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ग़ज़ल
किताबें चीख़ने लगती हैं जब वो पास से गुज़रे
इन्हें वो चूम के रखती है सीने से लगाती है
अज़ीम कामिल
ग़ज़ल
बीन हवा के हाथों में है लहरे जादू वाले हैं
चंदन से चिकने शानों पर मचल उठे दो काले हैं
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
एक नज़्म इजाज़तों के लिए
कि मैं चूसने वाली गोली की तरह
अपनी मिठास की तह घुला चुकी हूँ
किश्वर नाहीद
ग़ज़ल
तर्क-ए-मोहब्बत तर्क-ए-तमन्ना कर चुकने के बाद
हम पे ये मुश्किल आन पड़ी है कैसे भुलाएँ तुम्हें
ज़ुहूर नज़र
नज़्म
सुरय्या की गुड़िया
वो गुड़िया मगर और भी डर गई
लगी चीख़ने ''हाए मैं मर गई''
