aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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जीफ़ ज़िया
born.1990
शायर
यमित पुनेठा ज़ैफ़
शौक़ी ज़ैफ़
लेखक
अब्दुल ग़नी मीर ज़ाइफ़
वो गाँव का इक ज़ईफ़ दहक़ाँ सड़क के बनने पे क्यूँ ख़फ़ा थाजब उन के बच्चे जो शहर जाकर कभी न लौटे तो लोग समझे
ज़ईफ़ बरगद के हाथ में रा'शा आ गया हैजटाएँ आँखों पे गिर रही हैं उठाए कोई
ग़ालिब कि देवे क़ुव्वत-ए-दिल इस ज़ईफ़ कोतिनके को जो दिखावे है पल में पहाड़ कर
क़वी भी है ज़ईफ़ भी हमारा हाफ़िज़ा 'शुऊर'मज़े तमाम याद हैं अज़ाब एक भी नहीं
जहाँ ख़ुदा के निशान-ए-पा ने पनाह ली हैजहाँ ख़ुदा की ज़ईफ़ आँखें
ज़ैफ़ضَیف
अतिथि, मेहमान
ज़'ईफ़ضَعیف
निर्बल, शक्तिहीन, कमज़ोर
ज़'ईफ़-उल-'उम्रضَعیفُ الْعُمْر
वयोवृद्ध, बड़ी आयु वाला, ज़्यादा उम्र वाला, बूढ़ा
ज़'ईफ़-हालضَعِیف حال
ग़रीब, निर्धन, लाचार, मुसीबतज़दा
Jadeed Arabi Adab
भाषा एवं साहित्य
Arabi Nasr Ka Fanni Irteqa
ज़ईफ़ बूढ़ी जो पुल पर उदास बैठी हैउसी की आँख में लिक्खा है ज़िंदगी हूँ मैं
शिकस्ता बाल हूँ वो मुर्ग़-ए-नातवाँ-ओ-ज़ईफ़कि मैं तो मैं न उड़े मेरे आशियाँ की तरह
इब्तिदा से हम ज़ईफ़ ओ ना-तवाँ पैदा हुएउड़ गया जब रंग रुख़ से उस्तुख़्वाँ पैदा हुए
अब मुझ ज़ईफ़-ओ-ज़ार को मत कुछ कहा करोजाती नहीं है मुझ से किसू की उठाई बात
'असद' ब-नाज़ुकी-ए-तब'-ए-आरज़ू इंसाफ़कि एक वह्म-ए-ज़'ईफ़-ओ-ग़म-ए-दो-'आलम है
ज़ईफ़ बाप की ख़िदमत की बात जब आईतो मौसमों की तरह से पिसर बदलते रहे
जो ज़ईफ़-ओ-अलील होता हैइश्क़ में भी ज़लील होता है
ज़ईफ़ उँगली को थाम कर मैंबड़ी सुहूलत से चल रहा था
'दर्द' हर-चंद मैं ज़ाहिर में तो हूँ मोर-ए-ज़ईफ़ज़ोर निस्बत है वले मुझ को 'सुलैमान' के साथ
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