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ग़ज़ल
साफ़-गोई में तो सुनते हैं 'फ़ना' है मशहूर
देखना ये है तिरे मुँह पे वो कहता क्या है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
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ग़ज़ल
'हश्र' मेरी शे'र-गोई है फ़क़त फ़रियाद-ए-शौक़
अपना ग़म दिल की ज़बाँ में दिल को समझाता हूँ मैं
आग़ा हश्र काश्मीरी
नज़्म
जौन-एलिया से आख़री मुलाक़ात
इधर-उधर से यहाँ वहाँ से अजब कहानी गढ़ी गई थी
समझ में आई न इस लिए भी के दरमियाँ से पढ़ी गई थी
तारिक़ क़मर
शेर
बुराई या भलाई गो है अपने वास्ते लेकिन
किसी को क्यूँ कहें हम बद कि बद-गोई से क्या हासिल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
गायकी में जितने सुर थे खा गई शोरीदगी
शाइरी में जितने भी थे इस्तिआ'रे मर गए






