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नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
हिल्म के साँचे में रूह-ए-नाज़ को ढाले हुए
गर्दनों में ख़म सरों पर चादरें डाले हुए
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
रू-ब-रू उस के कभू बात न सुधरी हम से
हिल्म है चैन है दहशत है हया है क्या है
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
ग़ज़ल
है शुजा'अत-ओ-सख़ा हिल्म हया 'क़ासिम-अली'
शान में शेर-ए-ख़ुदा के हैं ख़तम चारों एक
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
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ग़ज़ल
'वक़ार-हिल्म' अली वालों से ख़ुदा की क़सम
पुल-सिरात के रस्ते भी राह रखते हैं
वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी
ग़ज़ल
इक-बटा-दो को करूँ क्यूँ न रक़म दो-बटा-चार
इस ग़ज़ल पर है क़वाफ़ी का करम दो-बटा-चार
वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी
नज़्म
शहर-ए-ख़मोशाँ को देख कर
वो शह-ज़ोर आज बेकस हैं जो कमज़ोरों से लड़ते थे
ख़ुदा जाने कि अहल-ए-हिल्म से क्यूँकर बिगड़ते थे
अली मंज़ूर हैदराबादी
ग़ज़ल
दीवान-ए-बे-नुक़त से है तेरा 'वक़ार-हिल्म'
कहती है अहल-ए-फ़न से ये गौहर-ब-कफ़ हवा


