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नज़्म
कभी कभी
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
तमाम इल्म ज़ीस्त का गुज़िश्तगाँ से ही हुआ
अमल गुज़िश्ता दौर का मिसाल में मिला मुझे
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
ज़िंदा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी
हर-चंद कि हूँ होश में हुश्यार नहीं हूँ
अकबर इलाहाबादी
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ग़ज़ल
'मीर' के मानिंद अक्सर ज़ीस्त करता था 'फ़राज़'
था तो वो दीवाना सा शा'इर मगर अच्छा लगा
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
गर दिल को बस में पाएँ तो नासेह तिरी सुनें
अपनी तो मर्ग-ओ-ज़ीस्त है उस बेवफ़ा के हाथ
निज़ाम रामपुरी
ग़ज़ल
मिरी ज़ीस्त पर मसर्रत कभी थी न है न होगी
कोई बेहतरी की सूरत कभी थी न है न होगी
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
परछाइयाँ
बहुत दिनों से सितम-दीदा शाह-राहों में
निगार-ए-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी
मेरे सीने में तिरा नाम धड़कता है अभी
ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी
परवीन शाकिर
नज़्म
आख़िरी ख़त
वो वक़्त मिरी जान बहुत दूर नहीं है
जब दर्द से रुक जाएँगी सब ज़ीस्त की राहें



