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नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
अल्लामा इक़बाल
शेर
यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
अल्लामा इक़बाल
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bhii.D
भीड़ بِھیڑ
किसी चीज या बात की अधिकता, जैसे-काम की भीड़, उदा०-परी रस भीड़ दृग धीर नाहिंन धरे, -अलबेला अली, आपत्ति, मुसीबत, संकट, उदा०-(क) जुग जुग भीर (भीड़) हरी संतन की,-मीराँ, (ख) तुम हरो जन की भीर (भीड़)।-मीराँ, क्रि० प्र०-कटना, -काटना,-पड़ना
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हास्य
मुतमइन हो कोई क्यूँ-कर कि ये हैं नेक-निहाद
है हनूज़ उन की रगों में असर-ए-हुक्म-ए-जिहाद
अकबर इलाहाबादी
शेर
ज़िंदगी नाम है इक जोहद-ए-मुसलसल का 'फ़ना'
राह-रौ और भी थक जाता है आराम के बा'द
फ़ना निज़ामी कानपुरी
नज़्म
रात सुनसान है
जोहद-ए-हस्ती की कड़ी धूप में थक जाने पर
जिस की आग़ोश ने बख़्शा है मुझे माँ का ख़ुलूस
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
आख़िरी लम्हा
हर जोहद हर अमल का तक़ाज़ा हसीन है
चमन से चंद ही काँटे मैं चुन सका लेकिन
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
याद
नहीं हो तुम मगर वो चाँद तारे याद आते हैं
मिरी नज़रों से ओझल अब मक़ाम-ए-जोहद-ए-हस्ती है
शौकत परदेसी
नज़्म
ख़ाक-ए-दिल
अश्क पत्थर की तरह जम से गए हैं मेरे
ज़िंदगी अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल ही सही
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
फिर वही जोहद-ए-मुसलसल फिर वही फ़िक्र-ए-मआश
मंज़िल-ए-जानाँ से कोई कामयाब आया तो क्या
शकील बदायूनी
नज़्म
मुद्दत के बाद
मैं ने भी एक जोहद-ए-मुसलसल में काट दी
वो उम्र थी जो फूल से अरमाँ लिए हुए

