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ग़ज़ल
तुम्हारी बे-रुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
गो हवा-ए-गुलसिताँ ने मिरे दिल की लाज रख ली
वो नक़ाब ख़ुद उठाते तो कुछ और बात होती
आग़ा हश्र काश्मीरी
नज़्म
मुफ़्लिसी
औरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाए
इस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसी
नज़ीर अकबराबादी
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शेर
रफ़ीक राज़
ग़ज़ल
अर्पित शर्मा अर्पित
ग़ज़ल
मोहसिन नक़वी
नअत
आओ दर-ए-ज़ोहरा पर फैलाए हुए दामन
है नस्ल करीमों की लज-पाल घराना है
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
आख़िरी लम्हा
तुम एक ऐसे घराने की लाज हो जिस ने
हर एक दौर को तहज़ीब ओ आगही दी है
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
तिरे शान-ए-करम की लाज रख ली ग़म के मारों ने
न होता ग़म तो इस दुनिया में हर बंदा ख़ुदा होता
नौशाद अली
नज़्म
यादें
कभी कोई सिफ़्ला है आक़ा कभी कोई अब्ला फ़र्ज़ीं
बेची लाज भी अपने हुनर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
ग़ज़ल
मैं फ़क़ीर आस्ताँ हूँ मिरी लाज रख ख़ुदारा
ये जबीन-ए-शौक़ मेरी तिरे दर पे झुक गई है


