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हास्य
अपनी कश्ती केस की मंजधार में है अब तलक
मुक मुक्का जब कर लिया तो पार हो जाएँगे हम
बाक़र वसीम क़ाज़ी
ग़ज़ल
कम-निगाही होर तग़ाफ़ुल मत कर ऐ माह-ए-तमाम
मुक तिरा करता है ग़म्ज़ा काम आशिक़ का तमाम
क़ुर्बी वेलोरी
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ग़ज़ल
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है




