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कहानी
प्रेमचंद
नज़्म
जाड़े की बहारें
जब माह अघन का ढलता हो तब देख बहारें जाड़े की
और हँस हँस पूस सँभलता हो तब देख बहारें जाड़े की
नज़ीर अकबराबादी
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
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रेख़्ता शब्दकोश
puus
पूस پُوس
विक्रमी संवत् का दसवाँ महीना, फ़सली सन का चौथा महीना जिसमें सर्दी बहुत कठोर होती है, वह चांद्र-मास जो अगहन के बाद पड़ता है, हिन्दुओं के मुताबिक़ साल का नवां महीना जिसमें सर्दी बहुत कठोर होती है, दिसंबर जनवरी का ज़माना जब कि पूरा चांद पुष्य नछत्तर यानी बुरज-ए-सर्तान के तीन सितारों के पास रहता है, पौष माह
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ग़ज़ल
जगदीश प्रकाश
लेख
मोहम्मद हसन असकरी
ग़ज़ल
मौसम की मार वक़्त का कोड़ा है मेरी सम्त
अब जो भी जिस तरह भी है अच्छा है मेरी सम्त
पुष्पराज यादव
नज़्म
चली आना अगर तुम तक मिरी आवाज़ जा पहुँचे
ये रौशन सुब्ह ये मीठे सुरों में पंछियों के गान
किसी कमसिन की दस्तक से उठी ये नूपुरों की तान
पुष्पराज यादव
नज़्म
ज़िंदगी
पूस की इन कड़कड़ाती सर्दियों में एक रात
आसमाँ की छत के नीचे शब-गुज़ारी कीजिए



