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ग़ज़ल
मेरे होंटों ही पे उड़ती रही आवाज़ की राख
कैसे लौ दे ये किसी ख़ित्ता-ए-बर्फ़ानी में
रज़ी अख़्तर शौक़
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विषय
खेत
खेत शायरी
समस्त
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नज़्म
याद
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले
खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब

