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शायरी के अनुवाद
फिर एक उम्र की चाह को विश के घूँट की तरह पी कर
उस के लर्ज़ां हाथ ने मेरा हाथ थाम लिया
अमृता प्रीतम
ग़ज़ल
चराग़ शर्मा
ग़ज़ल
बुतान-ए-महविश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
कि जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं
दाग़ देहलवी
हिंदी ग़ज़ल
हमें ज़रा बन-वास काटना पड़ा अगर कुछ दिन तो क्या
उस की सोचो जो जंगल को ही अपना घर-बार कहे






