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नज़्म
क्लर्क का नग़्मा-ए-मोहब्बत
यूँ कहता है वूँ कहता है लेकिन बेकार ही रहता है
मैं उस की ऐसी बातों से थक जाता हूँ थक जाता हूँ
मीराजी
कहानी
क़ुर्रतुलऐन हैदर
लेख
अब्दुल माजिद दरियाबादी
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ग़ज़ल
न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है
तबद्दुल याँ है हर साअ'त कभी यूँ है कभी वूँ है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
कन-अँखियों की निगह गुपती इशारत क़हर चितवन के
जो वूँ देखा तो बर्छी है जो यूँ देखा तो भाला है
नज़ीर अकबराबादी
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
नज़्म
बम्बई रात समुंदर
पड़े हैं गेट-वे-आफ़-इंडिया के फ़र्श पर बे-घर भिकारी
उधर हैं कुछ जुआरी
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
एक देसी हसीना से मुलाक़ात
सब-वे में नज़र आई मुझे एक हसीना
रूसी नज़र आती थी हक़ीक़त में थी चीना
खालिद इरफ़ान
लेख
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
अब और तब
वो ज़ीने ही में टकराने की हसरत रह गई दिल में
सुना वन-वे ट्रैफ़िक हो गई ऊपर की मंज़िल में
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
लेख
गोपी चंद नारंग
ग़ज़ल
कहते हो वूँ से हो के इधर आओ वूँ चलें
क्या ख़ूब क्यूँ न दौड़ पड़ूँ ऐसे दम के साथ


