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नज़्म
'शोपीं' का नग़्मा बजता है
और चाहने वालों की गर्दन में झूले डाले बाहोँ ने
फिर झरने नाचे छन छन छन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जागीर
हाए ये शाम ये झरने ये शफ़क़ की लाली
मैं इन आसूदा फ़ज़ाओं में ज़रा झूम न लूँ
साहिर लुधियानवी
हिंदी ग़ज़ल
धूप का जंगल नंगे पाँव इक बंजारा करता क्या
रेत के दरिया रेत के झरने प्यास का मारा करता क्या
अंसार कंबरी
कहानी
बेटे को अब धीरे-धीरे होश आने लगा था। “आओ कहीं और बैठ कर बातें करते हैं।” (4)...