बर्फ़बारी से पहले

कुर्रतुलऐन हैदर

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कुर्रतुलऐन हैदर

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    “आज रात तो यक़ीनन बर्फ़ पड़ेगी”, साहिब-ए-ख़ाना ने कहा। सब आतिश-दान के और क़रीब हो के बैठ गए। आतिश-दान पर रखी हुई घड़ी अपनी मुतवाज़िन यकसानियत के साथ टक-टक करती रही। बिल्लियाँ कुशनों में मुँह दिए ऊँघ रही थीं, और कभी-कभी किसी आवाज़ पर कान खड़े कर के खाने के कमरे के दरवाज़े की तरफ़ एक आँख थोड़ी सी खोल कर देख लेती थीं। साहिब-ए-ख़ाना की दोनों लड़कियाँ निटिंग में मशग़ूल थीं। घर के सारे बच्चे कमरे के एक कोने में पुराने अख़बारों और रिसालों के ढेर पर चढ़े कैरम में मसरूफ़ थे।

    बौबी मुमताज़ खिड़की के क़रीब ख़ामोश बैठा इन सबको देखता रहा।

    “हाँ आज रात तो क़तई’ बर्फ़ पड़ेगी”, साहिब-ए-ख़ाना के बड़े बेटे ने कहा।

    “बड़ा मज़ा आएगा। सुब्ह को हम स्नोमैन बनाएँगे”, एक बच्चा चिल्लाया।

    “मुमताज़ भाई-जान हमें अपना पाइप दे दोगे? हम उसे स्नोमैन के मुँह में ठूँसेंगे”, दूसरे बच्चे ने कहा।

    “कल सुब्ह शुमाल में हल्के-हल्के छींटे पड़ेंगे। और शुमाल मग़रिब में आँधी के साथ बारिश होगी। जुनूबी बलूचिस्तान और सिंध का मौसम ख़ुश्क रहेगा”, साहिब-ए-ख़ाना ने नाक पर ऐ'नक रखकर अख़बार उठाया और मौसम की पेशीन-गोई बा-आवाज़-ए-बुलंद पढ़नी शुरू’ की।

    “ख़ूब बर्फ़ पड़ती है भाई। लेकिन एक बात है। उस तरफ़ फल बहुत उ'म्दा होते हैं। ऐबट आबाद में जब में था”, साहिब-ए-ख़ाना के मँझले बेटे ने ख़ुद ही अपनी बात जारी रखी।

    बौबी मुमताज़ चुपका बैठा हँसता रहा।

    “सारी दुनिया मौसम में इतनी शदीद दिलचस्पी क्यों लेती है। क्या इन लोगों को इस वक़्त गुफ़्तगू का कोई इससे ज़ियादा बेकार मौज़ू' नहीं सूझ रहा। क्वीनी लखनऊ रेडियो पर रोज़ाना आठ पचपन पर अंग्रेज़ी में मौसम की रिपोर्ट सुनाती थी। कल पच्छम में तेज़ हवा के साथ पानी आएगा। पूरब में सिर्फ़ थोड़े छींटे पड़ेंगे, उतर में सर्दी बढ़ जाएगी... क्वीनी... क्वीनी बी-बी... जो... फ्रे़ड कहाँ हो तुम सब... इस वक़्त तुम सब जाने क्या कर होगे”, उसने बहुत थक कर आँखें बंद कर लीं।

    “मुमताज़ साहिब आज तो आप हमारे साथ ही खाना खाइए”, साहिब-ए-ख़ाना की बेगम ने कहा और शाल लिपटती हुई खाने के कमरे की तरफ़ चली गईं। उनकी आवाज़ पर आँखें खोल कर वो उन्हें पैंट्री के दरवाज़े में ग़ाइब होते देखता रहा।

    साहिब-ए-ख़ाना की दो लड़कियाँ थीं। यही सारी बात थी। इसी वज्ह से उसकी इतनी ख़ातिरें की जा रही थीं। जब से वो पाकिस्तान मुंतख़ब करने के बा'द क्वेटा आया था, ये ख़ानदान उसे रोज़ाना अपने हाँ चाय या खाने पर मदऊ’' करता। अगर वो आना चाहता तो वो जाकर उसे क्लब से पकड़ लाते। उसके लिए रोज़ तरह तरह के हल्वे तैयार किए जाते। उसकी मौजूदगी में उनकी बड़ी लड़की फीके शलजम के ऐसे चेहरे वाली सई'दा बड़ी मा'सूमियत और नियाज़-मंदी के साथ एक तरफ़ को बैठी निटिंग करती रहती। उसका चेहरा हर क़िस्म के तअ'स्सुरात से ख़ाली रहता। जैसे किसी कुल वाली चीनी की गुड़िया की उँगलियों में तितलियाँ थमा दी गई हों। कभी-कभी वो दूसरों की तरफ़ नज़र उठा कर देखती और फिर ख़ुद-ब-ख़ुद शर्मा कर दोबारा निटिंग पर झुक जाती।

    ये लड़कियाँ कितनी निटिंग करती हैं। बस साल भर इनके हाथों में ऊन और सलाइयाँ देख लो। गोया ये ऊन के बने हुए पुलओवर और मोज़े क़यामत के रोज़ इन्हें बख़्शवाएँगे। फिर साहिब-ए-ख़ाना की बेगम बावर्चीख़ाने से वापिस आकर ख़ानसामाँ की ना-मा'क़ूलियत पर इज़हार-ए-ख़याल करने के बा'द अपनी सुघड़ बेटी को तहसीन-आमेज़ नज़रों से देखतीं और उसे मुख़ातिब हो कर कहतीं,

    “बस इसको तो यही शौक़ है। दिन-भर इसी तरह किसी किसी काम में लगी रहती है। अपने अब्बा का ये स्वेटर-कोट भी इसी ने बुना है।”

    उस वक़्त वो यक़ीनन मुतवक़्क़े’ होतीं कि वो कहे, “ऊन मँगवा दूँगा मेरे लिए भी एक पुलओवर बना दीजिए।”, लेकिन वो उसी तरह ख़ामोश बैठा रहता। लड़की अपनी डायरैक्टर आफ़ प्रोपगंडा ऐंड पब्लिसिटी की तरफ़ से ये ता'रीफ़ होती सुनकर और ज़ियादा शर्मा जाती और उसकी सलाइयाँ ज़ियादा तेज़ी से मुतहर्रिक हो जातीं।

    ख़ुदावंद... बौबी मुमताज़ ने बहुत ज़ियादा उकता कर खिड़की से बाहर नज़र डाली। अँधेरे में चनार के दरख़्त आहिस्ता-आहिस्ता सरसरा रहे थे। इस गर्म और रौशन कमरे के बाहर दूर-दूर तक मुकम्मल सुकूत तारी था। रात का गहरा और मुंजमिद सुकूत। वो रात बिल्कुल ऐसी थी अँधेरी और ख़ामोश। 9 सितंबर 47 की वो रात जो उसने अपने दोस्तों के साथ मसूरी के वाइल्ड रोज़ में आख़िरी बार गुज़ारी थी। क्वीनी और वजाहत का वाइल्ड रोज़। जब वो सब वाइल्ड रोज़ के ख़ूबसूरत लाऊंज में आग के पास बैठे थे और किसी को पता नहीं था कि वो आख़िरी मर्तबा वहाँ इकट्ठे हुए हैं। लेकिन वो रात भी पलक झपकते में गुज़र गई थी। वक़्त इसी तरह गुज़रता चला जाता है।

    साहिब-ए-ख़ाना ने दफ़अ'तन बड़े ज़ोर से हँसना शुरू’ कर दिया। उसने चौंक कर उन्हें देखा। वो एक हाथ में अख़बार थामे वीकली के किसी कार्टून पर हँस-हँसकर दोहरे हुए जा रहे थे। बच्चे अपने तस्वीरों वाले रिसाले और कैरम छोड़कर उसके क़रीब गए और उससे कहने लगे कि अगर रात को उसकी मोटर बर्फ़ में फँस गई तो कितना मज़ा आएगा... एक बच्ची ने नाव बनाने के लिए औनलुकर का सर-वरक़ फाड़ डाला और एक तस्वीर दूसरी तराशी हुई तस्वीरों और कतरनों के साथ रिसाले में से सरक कर फ़र्श पर गिरी।

    बौबी मुमताज़ की नज़र उस तस्वीर पर पड़ गई। उसने झुक कर देखा। वो सिग्रिड की तस्वीर थी। सिग्रिड अपने प्यारे से दो माह के बच्चे को मेज़ पर हाथों से थामे उसके पीछे से झाँक रही थी। वही मख़सूस तबस्सुम, उसके बाल उसी स्टाइल से बने थे। उसकी आँखें उसी तरह पुर-सुकून और पुर-असरार... उस तस्वीर के लिए बच्चों में छीना-झपटी शुरू’ हो गई। उसके जिस्म में सर्दी की एक तेज़ ना-क़ाबिल-ए-बर्दाश्त काटती हुई लहर दौड़ गई। उसने पीछे मुड़ कर देखा। खिड़की बंद थी और आतिश-दान में शोले भड़क रहे थे। कमरा हस्ब-ए-मा'मूल गर्म था।

    बच्चे उसी तरह शोर मचा रहे थे। लड़कियाँ निटिंग कर रही थीं। उसका दिल डूब रहा था। ये सिग्रिड की तस्वीर थी जो एक बच्ची ने बे-ख़याली से नए औनलुकर में से काट ली थी... सिग्रिड... सिग्रिड वो दफ़अ'तन कुर्सी पर से उठ खड़ा हुआ..

    “कहाँ चले...? खाना आने वाला है”, साहिब-ए-ख़ाना हाथ फैला कर चलाए।

    “बस पाँच मिनट और ठहर जाओ भैया। तवा चढ़ा ही है”, बेगम साहिब ने कहा।

    “खाना ख़ाके जाइएगा”, सई'दा ने अपनी पतली सी आवाज़ आहिस्ता से बुलंद करके चुपके से कहा और फिर जल्दी से सलाइयों पर गई।

    “हाँ-हाँ भाई जान... खाना खा के... और फिर अपना पाइप…”, बच्चों ने शोर मचाया। और फिर तस्वीर के लिए छीना-झपटी होने लगी।

    “अरे मुझे दे... मैं इसकी मूँछें बनाऊँगा”, एक बच्चा अपनी छोटी बहन के हाथों से तस्वीर छीनने लगा। “नहीं, पहले मैं। मैं डाढ़ी भी बनाऊँगी इसकी। जैसी चचा मियाँ की है”, बच्ची ने ज़ोर लगाया।

    “मैं इस मिसिज़ सिग्रिड उसमान के होंटों में पाइप लगा दूँगा”, दूसरा बच्चा चिल्लाया।

    “वाह, लड़कियाँ पाइप कहाँ पीती हैं”, पहले बच्चे ने ए'तिराज़ किया।

    “मुमताज़ भाई जान तो पीते हैं”, उसने अपनी मंतिक़ इस्तिमाल की।

    “मुमताज़ भाई जान कोई लड़की थोड़ा ही हैं।”, सबने फिर क़हक़हे लगाने शुरू’ कर दिए।

    बौबी मुमताज़ इंतिहाई बद-अख़्लाकी का सबूत देता कमरे से निकल कर जल्दी से बाहर आया। और अपनी ओपल तक पहुँच कर सबको शब-ब-ख़ैर कहने के बा'द तेज़ी से सड़क पर गया। रास्ता बिल्कुल सुनसान पड़ा था। और फ़रवरी का आसमान तारीक था। उसके मेज़बानों का घर दूर होता गया। बच्चों के शोर की आवाज़ पीछे रह गई। बिल्कुल ख़ाली-उल-ज़हन हो कर उसने कार बेहद तेज़ रफ़्तारी से सीधी सड़क पर छोड़ दी। घर चला जाए। उसने सोचा। फिर उसे ख़याल आया कि उसने अभी खाना नहीं खाया। उसने कार का रुख़ क्लब की तरफ़ कर दिया।

    एक बैरे को खाने के मुतअ'ल्लिक़ कहते हुए वो एक लाऊंज की तरफ़ चला गया। जो अक्सर सुनसान पड़ी रहती थी। उसने सोफ़े पर लेट कर आँखों पर हाथ रख लिए। उसने आँखें बंद कर लीं। उसे लग रहा था जैसे वो सोचने समझने, महसूस करने, याद करने की सारी आदतें भूल चुका है। अब कुछ बाक़ी नहीं, कुछ बाक़ी नहीं।

    उसने हाथों से अपनी आँखों को ख़ूब मला। और फिर ग़ौर से हथेलियों को देखने लगा। उसने महसूस किया कि इस वक़्त उसकी आँखें बहुत सूनी-सूनी लग रही होंगी। वो आँखें जिनके लिए कमला कहा करती थी कि इंतिहाई शराब उंडेलने वाली आँखें हैं। उसकी आँखों की ये ता'रीफ़ सबको याद हो गई थी। बौबी मुमताज़ की शराब उंडेलने वाली आँखें। और वो उस वक़्त वहाँ, इस अजनबी शहर के ग़ैर दिलचस्प क्लब के नीम-तारीक ख़ामोश लाऊंज में सोफ़े पर बच्चों की तरह पड़ा अपनी हथेलियों से उन आँखों को मल रहा था। गोया बहुत देर का सोया हुआ अब जगा है। बराबर के कमरे में ख़ूब ज़ोर ज़ोर से रेडियो बजाया जा रहा था। बहुत से लोग बातों में मशग़ूल थे। वहाँ भी मौसम के मुतअ'ल्लिक़ बहस छिड़ी हुई थी।

    “आज रात तो यक़ीनन बर्फ़ पड़ेगी।”, कोई बेहद वसूक़ और एहमियत के साथ कह रहा था।

    “यहाँ बड़े कड़ाके का जाड़ा पड़ता है यारो”, दूसरे ने जवाब दिया। फिर सियासियात पर गुफ़्तगू शुरू’ हो गई। जहाँ चार आदमी इकट्ठे होते, ये लाज़िमी बात थी कि सियासत पर राय-ज़नी शुरू’ हो जाएगी। जवाहर लाल ने ये कहा। क़ाइद-ए-आ'ज़म ने ये कहा। माउंट बैटन ने ये कहा। ये अच्छा हुआ। ये बुरा हुआ। तुम कैसे आए? मैं ऐसे आया। मैं यूँ लुटा। मैंने रास्ते में यूँ तकलीफ़ें उठाईं। फ़लाँ मुलाज़िम हो गया। फ़लाँ ने इस्तीफ़ा दे दिया। फ़लाँ कराची में है। फ़लाँ पिंडी पहुँच चुका है..

    बौबी मुमताज़ लाऊंज के सोफ़े पर चुप-चाप पड़ा ये सब सुना किया। गैलरी की दूसरी जानिब एक कमरे में चंद अंग्रेज़ मैंबर और उनकी ख़वातीन क़रीब-क़रीब बैठे एक दूसरे के साथ मय-नोशी में मसरूफ़ थीं। क्लब का वो हिस्सा निसबतन सुनसान पड़ा था। 15 अगस्त के बा'द शहर और छावनी में जो इक्का-दुक्का अंग्रेज़ रह गए थे वो सर-ए-शाम ही से वहाँ आन बैठते और ‘होम’ ख़त लिखते रहते या तामस कuक और बी.ओ.ए.सी. वालों से पैसिज के मुतअ'ल्लिक़ ख़त-ओ-किताबत करते। उनकी बीवियाँ और लड़कियाँ उकताहट के साथ बैठी रिकार्ड बजाती रहतीं। उनके गुड ओल्ड डेज़ के पुराने साथी और अ'ज़ीज़ होम जा चुके थे और जाने कहाँ-कहाँ से नए-नए देसी मैंबर क्लब में आन भरे थे... डैडी ने दो साल के लिए कंट्रैक्ट किया है। चार्ल्स ने साल भर के लिए वौलेंटियर किया है। क्वेटा तो मारग्रेट डार्लिंग बेहद दिलचस्प स्टेशन था। पर अब। अब तो इतना मरने को जी चाहता है। वो बेबसी के आ'लम में क्लब के देसी मैंबरों की ख़वातीन देखतीं।

    “ओ गौश”, गैलरी में से गुज़रते हुए कर्नल रौजर्ज़ की सुर्ख़ बालों वाली लड़की ने चुपके से अपनी एक सहेली से उकता कर कहा, “आज वो भी नहीं आया…।”

    “वो कौन...?”, उसकी सहेली ने पूछा…।

    “वही... इंतिज़ामी सर्विस वाला... जो लखनऊ से आया है।”

    “अच्छा वो...”

    “हाँ, सख़्त बोर है। कल रात मेरा ख़याल था कि मुझसे रक़्स के लिए कहेगा। लेकिन चुप-चाप उल्लू की तरह आँखें झपकाता रहा।”

    “लेकिन कैरल डारलिंग कितनी बिल्कुल शराब उंडेलने वाली आँखें।”

    “होंगी... जैन डार्लिंग ये हिंदोस्तानी बिल्कुल एलिगेंट नहीं होते।”, वो दोनों बातें करती कार्ड रुम की तरफ़ चली गईं।

    बाहर दरख़्त हवा में सरसराते रहे। उसके एक दोस्त ने गैलरी में से लाऊंज में आकर रौशनी जला दी। वो चौंक कर सोफ़े पर से उठ बैठा।

    “अबे यार क्या अफ़ीमचियों की तरह बैठे हो। तुम्हें सारे में तलाश कर डाला, चलो कार्ड रुम में चलें। वहाँ रौजर्ज़ की लौंडिया भी मौजूद है। तुमने तो अभी सारा क्लब भी घूम कर नहीं देखा। ज़रा जाड़े निकलने दो, तफ़रीह रहेगी। सच पूछो तो ये शहर इतना बुरा नहीं। शुरू’ शुरू’ में तो सभी होम सिक, महसूस करते हैं लेकिन बहुत जल्द हम इन फ़िज़ाओं से मानूस हो जाएँगे”, उसके दोस्त ने कहा।

    “हाँ बिल्कुल ठीक कहते हो भाई”, उसने पाइप जलाते हुए बे-ख़याली से जवाब दिया, “चलो ज़रा पोंटून ही खेलें।”

    “तुम चलो। मैं अभी आता हूँ।”

    “जल्द आना। सब तुम्हारे मुंतज़िर हैं”, दोस्त ने बाहर जाते हुए कहा।

    बराबर के कमरे का शोर धीमा पड़ गया। शायद वो सब भी कार्ड रुम की तरफ़ चले गए थे। किसी बैरे ने ये समझ कर कि लाऊंज में कोई नहीं है। दरवाज़े में से हाथ बढ़ा कर लैम्प की रौशनी बुझा दी और आगे चला गया। लाऊंज में फिर वही नीम तारीकी फैल गई। रात का सेहर गहरा होता जा रहा था।

    “बौबी... बौबी...”, वो फिर चौंक पड़ा। उसने पीछे मुड़ कर देखा। इस नाम से इस अजनबी जगह में उसको किस ने पुकारा। इस नाम से पुकारने वाले उसके प्यारे साथी बहुत पीछे बहुत दूर रह गए थे

    बौबी... बौबी... नहीं... वहाँ पर कोई था।

    इस जगह पर तो महज़ मुमताज़ सग़ीर अहमद था। वो हँसी, वो शोर मचाने वाला, ख़ूबसूरत आँखों का मालिक, सब का चहेता बौबी तो कहीं और बहुत पीछे रह गया था। यहाँ पर सिर्फ़ मुमताज़ सग़ीर अहमद मौजूद था। उसने अपना नाम आहिस्ता से पुकारा। मुमताज़ सग़ीर अहमद कितना अ'जीब नाम है। वो कौन है। उसकी हस्ती क्या है क्यों और किस तरह अपने आपको वहाँ पर मौजूद पा रहा है... ये इंसान... ये इंसान सब कुछ महसूस करके, सब कुछ बता के अब तक ज़िंदा है। साँस ले रहा है। रात के खाने का इंतिज़ार कर रहा है। अभी वो कार्ड रुम में जाकर पौंटोन खेलेगा। कर्नल फ़्रीज़र की लड़की के साथ नाचेगा। इतवार को फिर उस शलजम की ऐसी शक्ल वाली लड़की सई'दा के घर मदऊ’ किया जाएगा।

    “बौबी... बौबी...”, क्वीनी बी-बी... उसने चुपके से जवाब दिया। क्वीनी बी-बी... “वुजू भैया... ये तुम हो...?”, उसने अँधेरे में हाथ बढ़ाकर कुछ महसूस करना चाहा। उसने सोफ़े के मख़मलीं कुशन को छुआ। मख़मल इतनी गर्म थी, और राहत पहुँचाने वाली। दरीचे के बाहर फ़रवरी की हवाएँ साएँ-साएँ कर रही थीं

    बौबी…, “हाँ क्वीनी बी-बी। तुम कहाँ हो। मैंने तुम्हारी आवाज़ सुनी है। अभी तुम और लू खिलखिला कर हँसी थीं। लेकिन वहाँ लू भी नहीं थी। वजाहत भी नहीं था। फ़्रेड भी नहीं था।”

    क्वीनी बी-बी... उसने चुपके से दोहराया। आठ पचपन। उसकी नज़र घड़ी पर पड़ गई वो उस वक़्त, सैंकड़ों हज़ारों मील दूर, नश्रगाह के स्टूडियो में बैठी अपने सामने रखे हुए बुलिटेन के ठेट संस्कृत अल्फ़ाज़ निगलने की कोशिश में मसरूफ़ होगी। और मौसम की रिपोर्ट सुना रही होगी। घड़ी अपनी मुतवाज़िन यकसानियत के साथ टक-टक करती रही।

    “वजाहत भाई... तुम इस वक़्त क्या कर रहे हो... और फ़्रेड... और... और... अनीस...।”

    बराबर के कमरे में लाहौर से मौसम की रिपोर्ट सुनाई जा रही थी और ख़ाली कमरे में उसकी आवाज़ गूँज रही थी। आज शुमाल में बर्फ़-बारी होगी। शुमाल मग़रिब में बारिश के छींटे पड़ेंगे। जुनूब में तेज़ हवाएँ चलेंगी... घड़ी उसी तरह टक-टक करती रही। टक-टक-टक। एक, दो, तीन, चार, पाँच...छः... छः साल... ये छः साल... ख़ुदा-वंद।

    इस तपिश, इस तड़प, इस बेचैनी के बा'द आख़िर-कार मौत आती है। आख़िर-कार ख़ुदा-ए-क़ुद्दूस का सपेद तख़्त नज़र आता है। आख़िर-कार वो ख़ूबसूरत विज़न दिखलाई पड़ता है। क्वीनी ने आहिस्ता-आहिस्ता कहा। पस-ए-मंज़र की मौसीक़ी दफ़अ'तन बहुत तेज़ हो गई।

    हाँ... आख़िर-कार वो ख़ूबसूरत विज़न दिखलाई पड़ता है। अरे तुम किधर निकल आए ज़िंदगी की तरफ़ वापिस जाओ। इन्क़िलाब और मौत के तुन्द-रू आँधियों के सामने ज़र्द, कमज़ोर पत्तों की तरह भागते हुए इंसान। हमारी तरफ़ वापिस लौटो... इस विज़न की तरफ़... इस वज़न की तरफ़... लो ठहर गई। ठीक है? उसने अपने हिस्से की आख़िरी सतरें ख़त्म करके स्क्रिप्ट फ़र्श पर गिरा दिया।

    “बिल्कुल ठीक है। थैंक यू…”, क्वीनी हेडफ़ोन एक तरफ़ को डाल कर बाहर गई। “लेकिन डार्लिंग तुमने टेम्पो फिर तेज़ कर दिया। ख़ुदा के लिए धीरे धीरे बोला करो।”

    “ओ गौश। ये टेम्पो तो किसी चीज़ का कभी भी ठीक नहीं हो सकता। क्वीनी डारलिंग…।”, लू ने उकता कर जवाब दिया

    “बौबी... बौबी…”, गैलरी में से वजाहत की आवाज़ सुनाई दी। “अरे क्या वुजू आया है?”, क्वीनी ने स्टूडियो का दरवाज़ा खोल कर बाहर झाँका।

    उसका भाई वजाहत इंतिज़ार के कमरे में खड़ा किसी से बातें कर रहा था। “बेटा घर चल रही हो?” उसने क्वीनी से पूछा। “तुम इस वक़्त कैसे गए?”, क्वीनी ने दरियाफ़्त किया।

    “मैं अभी-अभी बौबी मुमताज़ को बर्लिंगटन से लेने आया था। मैंने सोचा अगर तुम्हारा काम ख़त्म हो गया हो तो तुम्हें भी साथ लेता चलूँ”, वजाहत ने कहा।

    “बौबी मुमताज़ कौन?”, क्वीनी ने बे-ख़याली से पूछा।

    “है एक…”, वजाहत ने उसी बे-ख़याली से जवाब दिया। बौबी मुमताज़ ज़ीने पर से उतर के उनकी तरफ़ आया।

    “कहाँ भाग गए थे?”, वजाहत ने डपट कर पूछा।

    “अर… आदाब...”, बौबी मुमताज़ ने क्वीनी की तरफ़ मुड़कर कहा, “तुम ही क्वीनी बेटा होना?”

    “हाँ तस्लीम!”, क्वीनी नाख़ुन कुतरते हुए ग़ौर से उसके मुताले’ में मसरूफ़ थी। कितना स्वीट लड़का है। उसने दिल में कहा।

    “तो फिर चलो हमारे साथ ही घर”, बौबी मुमताज़ ने कहा।

    “नहीं भैया। अभी मुझे वो कमबख़्त मौसम की ख़बरें सुनानी हैं। आठ पचपन हो गए।”, वो उन्हें गैलरी में खड़ा छोड़कर स्टूडियो में तेज़ी से घुस गई। वो दोनों बाहर गए।

    ये ख़ुलूस, ये सादगी, ये अपनाइयत ऐसे प्यारे दोस्त उसे आज तक कहीं मिले थे। बहुत जल्द वो वजाहत के सट में घुल मिल गया। वो सब के सब इतने दिलचस्प थे। लियोनोर और शरजू लू कहलाती थी, जिसकी माँ अमरीकन और बाप पहाड़ी था। उसकी तिरछी-तिरछी नेपाली आँखों की वज्ह से सब उसे चिन्क चाय लू कहते थे और फ़्रेड जिसका तबस्सुम उतना मा'सूम, उतना पाकीज़ा, उतना शरीफ़ था। वो उसे छेड़ने के लिए हिंदुस्तानी ईसाई फ़िरक़े की मख़सूस हिमाक़तों का मज़ाक़ उड़ाते। लड़कियाँ ईसाइयों के बने हुए अंग्रेज़ी लहजे की नक़्ल कर के उससे पूछतीं, “फ़्रेड डियर क्या आज तुम किसी अपना गर्लफ्रेंड को बाहर नहीं ले जाने माँगता?”

    “क्यों तुम सब मेरी इतनी टाँग खींचते हो”, वो हँसकर कहता। वो बहुत ऊँचे ईसाई ख़ानदान से था। लेकिन उसे इस तरह छेड़ने में सबको बहुत लुत्फ़ आता। वो सब लू से कहते, “लू डियर अगर फ़्रेड इस संडे को प्रोपोज़ करे तो फ़ौरन मान जाओ। हम सब तुम्हारी बराईड्ज़ मेड्ज़ और पीच ब्वॉय बनेंगे।”, फिर वो चिल्ला-चिल्ला कर गातीं, “सम संडे मॉर्निंग।”

    वो 42 था, जब बौबी मुमताज़ पहली बार उन सबसे मिला। हर साल की तरह जब गर्मियाँ आईं और वो लोग मसूरी जाने लगे तो वो भी उनके हमराह मसूरी गया। क्वीनी और वजाहत केवाइल्ड रोज़ में सब इकट्ठे हुए। और वो वहाँ पर भी बहुत जल्द बेहद हर दिल-अ'ज़ीज़ हो गया।

    बड़ी ग़ैर-दिलचस्प सी शाम थी। वो सब हैकमैन्ज़ के एक कोने में बैठे सामने से गुज़रने वालों को उकताहट से देख रहे थे। और चंद मिलने वालों के मुंतज़िर थे। जिन्हें वजाहत ने मदऊ’ किया था। इतने में गैलरी में से चची अरना गुज़रती नज़र आईं उन्होंने बालों में दो तीन फूल ठोंस रखे थे। और ख़ानाबदोशों का सा लिबास पहने थीं।

    “कोई नया जनावर गिरा है”, यासमीन ने चुपके से क्वीनी से कहा।

    “अमाँ चुप रहो यार”, क्वीनी ने उसे डपट कर जवाब दिया।

    “क्या हुआ?”, बौबी ने पूछा।

    “कुछ नहीं”, क्वीनी ने जवाब दिया। इतने में उनके मेहमान गए। और वो सब ब-ज़ाहिर बड़ी संजीदा शक्लें बना कर उनके पास जा बैठीं।

    “ये चची अरना कौन हैं। तुम्हारी चची हैं?”, बौबी ने पूछा। ताज़ा वारिद मेहमान सब उन ही की बातें कर रहे थे।

    “अरे नहीं भई”, क्वीनी ने शगुफ़्तगी से जवाब दिया।

    “ये सिग्रिड की मम्मी हैं।”

    “सिग्रिड कौन?”, बौबी ने पूछा।

    “है... एक लड़की...।”, क्वीनी ने बे-ख़याली से गोया मज़ीद तशरीह कर दी और फिर दूसरी बातों में मुनहमिक हो गई।

    अगले रोज़ वो सब टहलने के लिए निकले तो वजाहत ने तजवीज़ किया कि वुडस्टाक का चक्कर लगा आएँ। सिग्रिड से भी मिलते आएँगे। वो टोलियाँ बना कर पत्थर और चट्टानें फलाँगते वुडस्टाक के होस्टल की तरफ़ गए।

    एक बड़े से सिलवर ओक के नीचे बौबी मुमताज़ ने सिग्रिड को देखा। वो इमारत की ढलवान पर दरख़्तों के झुंड में दूसरी लड़कियों के साथ बैठी निटिंग में मशग़ूल थी। उन सब को अपनी सिम्त आता देखकर वो बच्चियों की तरह दौड़ती हुई क्वीनी के क़रीब गई। क्वीनी ने उसका तआ'रुफ़ किराया, “ये हमारे बौबी भाई हैं। इतनी बढ़िया ऐक्टिंग करते हैं कि तुम देखकर बिल्कुल इंतिक़ाल कर जाओगी।”

    वो बच्चों की तरह मुस्कुराई। वो उसका मा'सूम, पाकीज़ा तबस्सुम, ऐक्टिंग उन दोनों का मुशतर्का मौज़ू’-ए-गुफ़्तुगू बन गया। वो सब शाम की चाय के लिए इकट्ठे वाइल्ड रोज़ वापिस आए।

    वो ज़माना जो उस साल बौबी मुमताज़ ने मसूरी में गुज़ारा, उसकी ज़िंदगी का बेहतरीन वक़्त था। मालपर से विनसंट हिल की तरफ़ वापिस आते हुए एक रोज़ उसने फ़्रेड से कहा, “ठाकुर पाल फ्रेडरिक रणबीर सिंह... क्या तुम जानते हो कि इस वक़्त दुनिया का सबसे ख़ुश-क़िस्मत इंसान कौन है?”

    फ़्रेड ने संजीदगी से नफ़ी में सर हिलाया।

    “सुनो”, उसने कहना शुरू’ किया। “जिस तरह अक्सर अख़बारों के मैगज़ीन सैक्शन में एक कालम छपता है कि दुनिया की सबसे ऊँची इमारत एम्पायर स्टेट बिल्डिंग है। दुनिया का सबसे बड़ा पुल सिडनी में है। दुनिया का अमीर-तरीन शख़्स निज़ाम-ए-हैदराबाद है। उसी तरह इस मर्तबा छुपेगा कि दुनिया का सबसे ख़ुश-क़िस्मत शख़्स मुमताज़ सग़ीर अहमद है। समझे ठाकुर साहिब... मुमताज़ सग़ीर... क्या समझे?”

    फ़्रेड खिलखिला कर हँस पड़ा। वो बहुत ही गिराँ-बार, संजीदा, सुलझा हुआ आदमी था। उसकी उ'म्र इकत्तीस-बत्तीस साल की रही होगी। बहुत ही कन्फ़र्मड क़िस्म का बैचलर था और सारे बैचलर्ज़ का माना हुआ गुरु। अपने एक निहायत ही सआ'दत-मंद चेले से ये बच्चों की सी बात सुनकर वो सिर्फ़ हँसता रहा। और उसने बौबी को कोई जवाब दिया। बौबी बे-फ़िक्री से सीटी बजाता आगे गया।

    सड़क की ढलवान पर से मुड़ते हुए उसकी नज़र एक बड़ी सी दो-मंज़िला कोठी पर पड़ी जिसे उसने आज तक नोटिस किया था। शायद उसकी वज्ह यही रही हो कि इस वक़्त उसके अहाते में ख़ूब गहमा गहमी नज़र रही थी। दरवाज़ों पर रोग़न किया जा रहा था। छत पर भी नया सुर्ख़-रंग किया गया था। एक अधेड़ उ'म्र के दाढ़ी-दराज़ बुजु़र्गवार बर-आमदे में खड़े क़ुलियों और नौकरों को हिदायात दे रहे थे। बड़ा कर्र-ओ-फ़र्र। बड़ी शान-ओ-शौकत नज़र रही थी।

    “ये किस का मकान है भई?”, बौबी ने एक क़ुली से पूछा।

    “ये...? क़ाज़ी जलीलुर्रहमान का एश्ले हाल”, क़ुली ने बड़े रौ'ब से उसे मतला’ किया। और आगे चला गया।

    सियाह बादल बहुत तेज़ी से बढ़ते रहे थे। यक-लख़्त बारिश का एक ज़ोरदार रेला गया। बौबी ने अपनी बरसाती सँभाल कर जल्दी से वाइल्ड-रोज़ के रास्ते चढ़ाई तय करनी शुरू’ कर दी।

    वो जुलाई का दूसरा हफ़्ता था। मौसम-ए-गर्मा की छुट्टियाँ ख़त्म हो रही थीं। चंद रोज़ बा'द वो सब मसूरी से वापिस गए।

    लेकिन क़ाज़ी जलीलुर्रहमान और उनके भाँजे अनीस को मौसमी तातीलात के ख़त्म हो जाने की परवा थी। वो मुरादाबाद के नवाह के ज़मींदार थे। उनके पास वक़्त और रुपये की फ़रावानी थी। और इन दोनों चीज़ों का कोई मुसर्रिफ़ उनकी समझ में आता था। इसी वज्ह से दोनों मामूँ भाँजे मसूरी आए थे और पानी की तरह रुपया बहाने में मसरूफ़ थे और अक्तूबर से पहले उनका मुरादाबाद जाने का कोई इरादा था।

    अनीस के वालिद का साल भर क़ब्ल इंतिक़ाल हो चुका था। और उसके मामूँ क़ाज़ी साहिब ने ख़ुद को उसका गै़र-क़ानूनी मुशीर मुक़र्रर कर रखा था। उनका असर उस पर बहुत ज़ियादा था। क़ाज़ी साहिब बेहद दिल-चले और शौक़ीन आदमी थे। बहनोई के इंतिक़ाल के बा'द उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि लड़का बहुत सीधा और ख़ासा कम-उ'म्र है और सारी रियासत अब उनके हाथ में है, लिहाज़ा अब तो रावी चीन लिखता है। चुनाँचे अनीस के वालिद की बरसी के बा'द पहला काम जो उन्होंने किया वो ये था कि पहाड़ पर चल के रहने के फ़वाइद उसे ज़हन-नशीन कराने शुरू’ किए।

    उसके हवालियों-मवालियों ने भी उठते-बैठते उससे कहा कि सरकार इक ज़री थोड़ी दूर किसी फ़रहत-बख़्श मक़ाम पर हो आवें तो ग़म ग़लत होवेगा। वो फ़ौरन मान गया और अपना लाव-लश्कर लेकर क़ाज़ी साहिब की क़ियादत में मसूरी आन पहुँचा। तय किया गया कि होटल में ठहरना झोल है और उठाई-गीरों का काम है जिनका कोई ठौर-ठिकाना नहीं होता। हरी चुग की तरह आए और होटल में ठहर गए। लिहाज़ा एक उ'म्दा सी कोठी ख़रीदना चाहिए। अनीस ने कहा कि यहाँ की सबसे बढ़िया कोठी कौन सी है वही ख़रीद ली जाए। लोगों ने बताया कि कपूरथला हाऊस यहाँ की बेहतरीन कोठी समझी जाती है। कोठी क्या अच्छा-ख़ासा महल है। अनीस ने फ़ौरन अपनी चेक-बुक निकाली। ''लाओ फिर उसे ही ख़रीद हैं,'' उसने कहा

    “अमाँ यार बावले हुए हो क्या। कपूरथला हाऊस तुम ख़रीद लोगे भला?”, एक दोस्त ने क़हक़हा लगाकर कहा।

    “हुज़ूर दूसरा बेहतरीन मकान भोपाल हाऊस है। लेकिन इत्तिफ़ाक़ से वो भी बुक नहीं सकता। तीसरी बेहतरीन कोठी इसपर यंग-डील है और चौथी कोठी हुज़ूर के लाएक़ एश्ले हाल है”, एक मुसाहिब ने इत्तिला दी।

    एश्ले हाल ख़रीद ली गई। उसे बेहतरीन साज़-ओ-सामान से आरास्ता किया गया। देहरादून से गोवा नीज़ मुलाज़िम और एक ऐंग्लो इंडियन हाऊस कीपर मँगवाई गई और एश्ले हाल मसूरी की चौथी बेहतरीन कोठी कहलाने लगी।

    अनीस जब पहले-पहल मसूरी गया है उसकी ता'लीम ब-क़ौल शख़्से सिर्फ़ सरसी से संभल तलक की थी। नौवीं क्लास से उसने स्कूल छोड़ दिया था। इससे आगे पढ़ने की ज़रूरत ही थी। अलबत्ता शेर के शिकार और शहसवारी और बुर्ज और घोड़-दौड़ के मैदान में रवेल खंड भर में दूर-दूर कोई उसका मुक़ाबला कर सकता था। सोला साल की उ'म्र में उसकी शादी कुन्बे की एक लड़की से कर दी गई थी जो एक और ज़मींदार की इकलौती बेटी थी। अपनी जागीर पर बैठा चैन की बंसी बजाता था।

    एश्ले हाल ख़रीद कर मसूरी में जब उसने रहना शुरू’ किया तो वहाँ की पहली झलक से उसकी आँखें चका-चौंद हो गईं। और उसने सोचा कि यार ये जो अब तक हम मुरादाबाद, संभल और अमरोहे में पड़े थे वो उतनी उ'म्र तो गोया बर्बाद ही गई। यहाँ तो एक अ'जीब-ओ-ग़रीब दुनिया आबाद थी। इंसानों की बस्ती थी। या इंद्र का अखाड़ा। चौदह तबक़ रौशन हो गए। लेकिन मुसीबत ये आन पड़ी कि एश्ले हाल का मालिक और मसूरी का सबसे ज़ियादा रुपया खर्चने वाला मेज़बान, लेकिन बिल्कुल ताज़ा-ताज़ा देहाती जागीरदार। इधर-उधर तो काम चल जाता था लेकिन ख़वातीन की सोसाइटी में बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ता था। पहला काम उसने ये किया कि एक ऐंग्लो इंडियन लेडी कम्पेनियन की ख़िदमात हासिल कीं। जो उसे सही अंग्रेज़ी बोलना और बाल रुम नाच सिखाए। चंद ही महीनों में वो एक और फ़र-फ़र अंग्रेज़ी बोलने वाला बेहद वेल ड्रेस्ड अनीस था जो मसूरी का सबसे ज़ियादा हर दिल-अ'ज़ीज़ शख़्स समझा जाता था। बिल्कुल ही काया पलट गई।

    अगले साल 43 की गर्मियों में जब क्वीनी वजाहत और उनका ग्रुप मसूरी पहुँचा तो उन्हें एक ताज़ा वारिद अजनबी बाल रूम्ज़ की सत्ह पर बहता नज़र आया। जिसने हर तरफ़ धूम मचा रखी थी। वजाहत उसे पहले से जानता था। लेकिन इस अचानक काया पलट पर वो भी उसे पहचान सका। इस साल वहाँ सारे मशहूर टेनिस स्टार्ज़ जमा थे। मिस ए'ज़ाज़, मिस काजी। ग़ियास मुहम्मद। अ'लीनगर की उबैदुल्लाह बहनें। उनकी भावज शाहनदा एहसान उबैदुल्लाह, बंबई से ज्योती भी हस्ब-ए-मा'मूल आया था। सीज़न अपने उ'रूज पर था। लखनऊ की खोचड़ बहनें भी हमेशा की तरह मौजूद थीं। निर्मला, प्रकाश, वायलट, रूबी ओब्ज़रोज़ा की पेशीन-गोई थी कि रूबी खोचड़ इस दफ़ा’ सालाना मुक़ाबला-ए-हुस्न में सिग्रिड रब्बानी से सबक़त ले जाएगी। एश्ले हाल की पार्टियों में ये सब अक्सर आतीं।

    एक रोज़ हैकमैन्ज़ में अनीस रक़्स का पहला दौर ख़त्म करके क्वीनी की तरफ़ आया और उसे सलाम करके वजाहत के क़रीब जा बैठा।

    “अबे ओबग़ चोंच... ये सूट बूट कैसे डाँट लिया। ये क्या स्वाँग भरा है ऐं?”, वजाहत ने उसे डाँट कर पूछा।

    उसने इधर-उधर देखकर लड़कियों की मौजूदगी में ज़रा झेंपते हुए चुपके से वजाहत से पूछा, “क्यों यार अब ठीक लगता हूँ न...?”

    “ज़रा इस गधे को देखना यासमीन डार्लिंग, ख़ुद तो शाम का लिबास पहन कर नाचता फिर रहा है और बीवी को वहीं क़स्बे में छोड़ रखा है। ऐसे आदमियों को तो बस...”, क्वीनी ने ग़ुस्से के साथ चुपके से कहा।

    उसके अगले दिन क्वीनी अपने मकान के ऊपर के बरामदे में आराम-कुर्सी पर काहिल बिल्ली की तरह लेटी पढ़ने में मशग़ूल थी कि दफ़अ'तन उसे बरामदे के शीशों में से नज़र आया कि नशेब में ख़ान बहादुर ए'जाज़ अहमद के काटज के सामने रिक्शाएँ खड़ी हैं। बहुत से लोग जा रहे हैं और ख़ूब चहल-पहल है। यहाँ तक कि उनके बावर्ची-ख़ाने में से धुआँ तक उठ रहा है। ये बेहद अ'जीब और नई बात थी। क्यों कि ख़ान बहादुर साहिब का ख़ानदान उ'मूमन या दूसरों के हाँ मदऊ’ रहता था या होटलों में खाना खाता था। वो बड़ी हैरत से ये मंज़र देखती रही।

    उसी वक़्त बारिश शुरू’ हो गई। और थोड़ी देर बा'द वजाहत और बौबी बरसातियों से लदे-फँदे भीगते भागते निचली मंज़िल की गैलरी में दाख़िल हुए। वो अभी ज़ीने ही पर थे कि क्वीनी चलाई, “अरे वुजू बौबी भैया जल्दी से ऊपर आओ...”

    और जिस वक़्त वजाहत और बौबी बरामदे के दरीचे में खड़े हुए उन्हें अनीस अपना बेहतरीन सूट पहने सिगार का धुआँ उड़ाता ख़ान बहादुर साहिब के काटज में से निकलता नज़र आया।

    “अच्छा... ये बात है…”, वजाहत ने बहुत आहिस्ता से कहा। उसे और बौबी को इतना रंजीदा देखकर क्वीनी का सारा एक्साइटमेन्ट रफ़ू-चक्कर हो गया। और वो भी बड़ी फ़िक्र-मंदी के साथ दोनों की कुर्सियों के नज़दीक फ़र्श पर बिल्ली की तरह बैठी और चेहरा ऊपर उठाकर दोनों लड़कों को ग़ौर से देखने लगी। वो दोनों ख़ामोश बैठे सिगरेट का धुआँ उड़ा रहे थे।

    चच चच चच... बेचारा स्वीट बौबी मुमताज़। क्वीनी ने बेहद हम-दर्दी से दिल में सोचा। लेकिन ज़ियादा देर तक उससे इस संजीदगी से बैठा गया। वो चुपके से उठकर भागी भागी गैलरी में पहुँची और यासमीन को फ़ोन करने के लिए रिसीवर उठाया।

    “मैंने तुमसे कहा था क्वीनी डियर कि इस साल तो कोई और भी बुरा जनावर गिरा है। उस पिछले साल वाले किसी जनावर से भी बड़ा।”

    दूसरे सिरे पर यासमीन बड़ी शगुफ़्तगी से कह रही थी, “और सुनो तो... कल मैंने सिग्रिड को नया लेपरडासकन कोट पहने देखा। ऐसा बढ़िया कि तुमने कभी ख़्वाब में भी देखा होगा। और चची अरना का नया इवनिंग गाऊन। अस्ली टीफ़ेटा है। इस जंग के ज़माने में अस्ली टीफ़ेटा क्वीनी डार्लिंग... और टोटो कह रही थी कि उसने मिसिज़ राज पाल से सुना जिन्हें बेगम फ़ारूक़ी ने बताया कि मिसिज़ नारंग ने उनसे कहा कि आजकल ख़ान बहादुर साहिब के हाँ की ख़रीदारी के सारे बिल लीलाराम और फैंसी हाऊस वाले सीधे एश्ले हाल भेज देते हैं... गौश।”

    “ओगौश...”, क्वीनी ने अपनी आँखें बिल्कुल फैला कर फूले हुए साँस से दोहराया।

    बारिश होती रही। रिसीवर रखकर वो आहिस्ता-आहिस्ता चलती हुई ऊपर गई और दरीचे में कुहनियाँ टेक कर बे-दिली से बाहर का मंज़र देखती रही जहाँ पानी के फ़व्वारों के साथ बादलों के टुकड़े इधर-उधर तैरते फिर रहे थे। वादी के नशेब में ख़ान बहादुर साहिब के काटज में पियानो बज रहा था और चची अरना अपने बरामदे में खड़ी किसी से बातें कर थीं।

    चची अरना स्वीडिश थीं। जब वो पहली बार अपने शौहर के हमराह हिन्दोस्तान आई थीं। उस वक़्त उनका ख़याल था कि सर आग़ा ख़ाँ के इस सुनहरे देस में वो भी एक मर्मरीं महल-सरा में किसी अलिफ़-लैला सुल्ताना की तरह रहा करेंगी। लेकिन जब वो यहाँ पहुँचीं तो उन्हें पता चला कि मर्मरीं सुतूनों और ईरानी क़ालीनों वाली महल-सरा के बजाए उनके शौहर असग़र रब्बानी लखनऊ के एक निहायत गंदे मुहल्ले विक्टोरियागंज में रहते हैं। जहाँ एक बूढ़ी माँ है जो हर वक़्त इमाम की मजलिसों में चिल्ला-चिल्ला कर रोने में मसरूफ़ रहती है। चार पाँच जाहिल और काली और सख़्त बे-हंगम बहनें और भावजें हैं। इन सब औरतों की सारी सोसाइटी झवाई टोला और मौलवी-गंज और नख़्ख़ास की गलियों तक महदूद है जहाँ वो सब डोलियों पर कुत्ते की तरह हाँपते हुए इंसानों के काँधों पर लद के, पर्देदार ताँगों में सवार हो के कभी-कभार उसी तरह के दूसरे गंदे मकानों और उन्ही की क़िस्म की दूसरी बे-हंगम औरतों से मिलने जाया करती हैं।

    अरना करटीना पर ये सब देखकर बे-होशी का सा आ'लम तारी हो गया। उनके प्यारे शौहर ने उन्हें दिलासा दिया कि जब उनका कारोबार चमक जाएगा तो वो शहर से बाहर गोमती के किनारे सिविल लाईन्ज़ में या छावनी में कोठी लेकर रहा करेंगे। लेकिन वो बरसों तक उस टाट के पर्दों वाले मकान से निकल सकीं। उनके बिल्कुल सोने की रंगत के दमकते हुए बाल थे। नीली आँखें थीं और गुलाब के शबनम-आलूद शगूफ़ों की ऐसी रंगत थी।

    लेकिन वाईट वेज़ के हाँ के मलबूसात पहन कर छतर मंज़िल क्लब में जगमगाने के बजाए उनकी क़िस्मत में तो यही ज़क भोगना लिखा था कि टोरियागंज के इस मकान की एक सख़ची में बैठी ठेट हिंदोस्तानी माओं की तरह महज़ सिग्रिड को पालती रहें और अपने मियाँ को कोसा करें। असग़र रब्बानी उठते बैठते उन्हें इत्मीनान दिलाते, “बस डार्लिंग चंद रोज़ की बात और है फिर हम चल कर अलग रहेंगे। तुम्हें कौन सी जगह ज़ियादा पसंद है, ट्रांस गोमती सिवल लाईन्ज़ या दिल-कुशा?”

    “जहन्नुम में जाए तुम्हारी ट्रांस गोमती”, और अरना करटीना फूट-फूट कर रोने लगीं। वाक़ई’ ये उनके लिए बड़ा सब्र-आज़मा ज़माना था। अच्छी अच्छी हिंदोस्तानी लड़कियों के जिन्हें बाहर की ज़रा सी भी हवा लग चुकी होती। इस माहौल में दहशत-ज़दा हो जातीं। वो फिर ख़ालिस विलाइती थीं।

    कई बरस इसी तरह लशटम-पशटम गुज़र गए। आख़िर एक साल असग़र रब्बानी किसी तरह रुपया फ़राहम करके उन्हें गर्मियाँ गुज़ारने के लिए मसूरी ले गए। वहाँ चची अरना की मुलाक़ात असग़र रब्बानी के एक दोस्त ख़ान बहादुर ए'जाज़ अहमद से हुई जो रिटायर्ड डिप्टी कलैक्टर थे, और बड़े ठाट से वहाँ ज़िंदगी गुज़ारते थे। चची अरना ने उनसे शादी करली। और सिग्रिड को वुडस्टाक स्कूल में दाख़िल कर दिया। और उसी तरह की ज़िंदगी गुज़ारने लगीं जिसकी उन्हें इतनी शदीद तमन्ना थी। उस दिन से लेकर आज तक किसी को असग़र रब्बानी के मुतअ'ल्लिक़ मा'लूम हो सका कि वो कहाँ हैं और किस हाल में हैं। उनके लिए तरह-तरह की रिवायतें मशहूर हैं। किसी ने उन्हें जमुना के किनारे दाढ़ी और जटाएँ बढ़ाए, साधुओं के साथ घूमते देखा। आख़िरी इत्तिला उनके मुतअ'ल्लिक़ ये थी कि कारोबार में सख़्त नुक़्सान उठाने के बा'द अपना बाक़ी-मांदा रुपया लेकर वो जुनूबी अफ़्रीक़ा चले गए।

    सिग्रिड जब बड़ी हुई उस वक़्त तक वो विक्टोरियागंज के मकान और अपने बाप को बिल्कुल भूल चुकी थी। वो अब मसूरी की 'बाल आफ़ फ़ायर कहलाती थी।उसका रंग बिल्कुल सफ़ेद नहीं था, उसमें हल्के हल्के हिंदोस्तानी साँवलेपन की झलक थी। उसकी आँखें बच्चों की तरह बड़ी-बड़ी और सियाह थीं। चची अरना कैथोलिक थीं। कैथोलिक मज़हब में जो गंभीरता है उसका पूरा पूरा असर सिग्रिड की उस तबीअ'त ने क़बूल किया था। उसके चेहरे पर अ'जीब तरह की फ़रिश्तों की सी मा'सूमियत बरसती थी। सोसाइटी लड़कियों में अक्सर जो छिछोरापन सत्हियत और चमक दमक होती है वो उससे कोसों दूर थी। उसे देखकर लगता था जैसे दुनिया से अलग-थलग, सैंट मेरी की मुक़द्दस राहबात की किसी ख़ानक़ाह में से निकल कर चली है।

    “ख़ुदावंदा... क्या सिग्रिड ऐसी भी हो सकती है...।”, क्वीनी ने बरामदे के दरीचे में खड़े-खड़े एक और जमाई लेकर बड़े दुख के साथ सोचा। उसे फिर बौबी मुमताज़ का ख़याल आया जो समझता था कि सिग्रिड ही वो लड़की है जिसका वो जनम-जनम से इंतिज़ार करता आया था। जो रूबी खोचड़ और अनवरी ख़ाँ और निशात स्टेनले और उनकी तरह की दूसरी लड़कियों से बहुत बुलंद है। बहुत बुलंद और बहुत मुख़्तलिफ़... ख़ुदावंदा… वो बे-दिली से वादी के नीले और सफ़ेद फूलों पर बारिश की फ़व्वारों को बरसता देखती रही। चची अरना के काटज में से पियानो की आवाज़ ब-दस्तूर बुलंद हो रही थी। कोई बड़े अच्छे सुरों में “स्वानी... हाव आई लव यू... हाव आई लव यू” का पुराना नग़्मा बजा रहा था।

    उसी शाम वाइल्ड रोज़ से वापसी पर बौबी मुमताज़ को रास्ते में निशात स्टेनले मिल गई। निशात स्टेनले बंबई रेडियो से अंग्रेज़ी में अनाउंसमैंट करती थी और कमर्शियल आर्ट की ता'लीम हासिल कर रही थी जो इंतिहाई बद-शक्ल थी। लेकिन जाने किस तरह इंतिहाई दिलकश मा'लूम थी।

    “ओ हलो बौबी मुमताज़। तुम्हें आज इतने चाँदों के बा'द देखा है। कहाँ थे?”, उसने चिल्ला कर कहा। “कहीं नहीं... यहीं था…”, बौबी ने उकताए हुए अंदाज़ में जवाब दिया और अपनी शराब उंडेलने वाली आँखें दूसरी तरफ़ घुमा दीं। वो एक हिरनी की तरह जस्त भर के पगडंडी पर से फिर उन आँखों की ज़द में खड़ी हुई।

    “ओ जीज़स... सदियों के बा'द नज़र आए हो। क्या सिग्रिड रब्बानी के छिन जाने का सोग मना रहे हो? बे-वक़ूफ़ हो। सोग करने के बजाए आओ इस हादिसे को सेलीब्रेट करें”, उसने बशाशत से कहा। और उसे खींचती हुई स्टैंडर्ड की तरफ़ ले गई। और वहाँ एक लाऊंज में पहुँच कर धम से एक कुर्सी पर गिरते हुए वो बैरे को अहकामात देने में मसरूफ़ हो गई।

    बौबी बे-दिली से उसे देखता रहा। उसे इस लड़की से इतनी नफ़रत थी। फिर भी इस लड़की में एक अ'जीब ना-क़ाबिल-ए-बयान, तकलीफ़-देह कशिश थी। इतनी बद-शक्ल... बद-शक्ल... उसने कोई तशबीह सोचनी चाही। लेकिन निशात स्टेनले की शख़्सियत से मुवाज़ना करने के लिए कोई मुनासिब चीज़ उसकी समझ में आई। ये लड़की जो फ़ख़्रिया कहती थी कि मुझसे बड़ा फ्लर्ट इस रू-ए-ज़मीन पर आपको दस्तयाब होगा। वो इलाहाबाद के एक बहुत आ'ला ईसाई ख़ानदान से तअ'ल्लुक़ रखती थी और बड़ी हम-दर्द, बड़ी फ़य्याज़ बेहद नेक दिल लड़की थी। अक्सर वो जज़्बाती बन कर अपने दोस्तों से कहती। लोग मुझे इतना बुरा समझते हैं, काश कोई मुझे पहचान सकता काश लोग इतने बे-वक़ूफ़, गधे होते।

    फिर उसने बैरे की तरफ़ से मुड़ कर बौबी से, “बौबी डियर क्यों ऐसी रोनी शक्ल बनाए बैठे हो। बे-वक़ूफ़ ज़रा और दरीचे से बाहर नज़र डालो। काएनात इतनी बश्शाश है, अर्ग़वानी बादल झुके हुए हैं, ठंडी हवाएँ चल रही हैं वादियों में नीले फूल खिल रहे हैं। क्या ऐसे में तुम रंजीदा रह सकते हो? उल्लू हो बिल्कुल।”

    बौबी हँस पड़ा। और फिर वो दोनों बच्चों की सी मुस्तइ'दी से इधर-उधर की बातें करने और क़हक़हे लगाने में मशग़ूल हो गए। बाहर पहाड़ों की बर्फ़ पर जगमगाती हुई चाँदनी ज़ियादा ख़ुश-गुवार हो गई।

    “सिवानी हाव आई लव यू... हाव आई लव यू...” का पामाल नग़्मा जो डांस बैंड वाले हाल के सिरे पर बजा रहे थे। यक-लख़्त बिल्कुल नया बहुत अनोखा और बेहद अच्छा मा'लूम होने लगा।

    दफ़अ'तन बौबी को ख़याल आया। मैं इस वक़्त यहाँ निशात स्टेनले के साथ बैठा हूँ। अगर क्वीनी ने मुझे इस लड़की के साथ इतनी बे-तकल्लुफ़ी से बातें करते देख लिया तो उसे कितना शौक पहुँचेगा। फिर उसने ज़िद्दी बच्चों की तरह सर झटक कर सोचा। अगर इस वक़्त क्वीनी और उसकी जैसी बा-इ'ज़्ज़त और ऊँची लड़कियों की एक पूरी ब्रिगेड यहाँ आकर खड़ी हो जाए और मुझे इसके साथ बैठा देखकर बेहोश हो जाएगी तब भी मैं ज़रा परवा करूँगा। क़तई’ परवा करूँगा। ये लड़की कितनी प्यारी थी कितनी हम-दर्द थी। बिल्कुल किसी प्यारी सी बहन की तरह हम-दर्द। उसे याद आया कल किसी ने उसके मुतअ'ल्लिक़ कैसी कैसी अ'जीब और ख़ौफ़नाक बातें उसे बताई थीं। अरे नहीं निशात। उसने चिल्ला कर कहना चाहा। तुम ऐसी नहीं हो। उसका जी चाहा कि वो कुर्सी पर चढ़ कर सारे स्टैंडर्ड, सारी मसूरी, सारी दुनिया को बताए। ये लड़की निशात स्टेनले बुरी नहीं है। तुम सब ख़ुद बुरे हो। तुम में अख़्लाक़ी क़ुव्वत नहीं है। इसलिए अपनी झेंप मिटाने की ख़ातिर तुम उसे बुरा कहते हो... तुम लोग...

    “हलो बौबी भैया... तुम यहाँ हो। हम तुम्हें सारे में ढूँढ आए”, उसने चौंक कर देखा। उसके सामने क्वीनी खड़ी थी जो उसी वक़्त लू, फ़्रेड और कमला के साथ अंदर दाख़िल हुई थी। वो ज़रा घबरा कर ता'ज़ीमन खड़ा हो गया और उसके लिए कुर्सी ख़ाली कर दी। निशात उसी तरह बे-फ़िक्री से कुर्सी पर नीम दराज़ एक गीत गुनगुनाती रही।

    “हलो क्वीनी”, उसने बे-परवाई से जमाई लेते हुए कहा।

    “हलो निशात”, क्वीनी ने बड़े ही बा-अख़्लाक़ लहजे में, जिसमें ये मलहूज़ रखा गया था कि उसका रूखापन और मुरब्बियाना, बे-तअ'ल्लुक़ अंदाज़ सबको महसूस हो जाए। उसे जवाब दिया।

    “हमें अभी ज़ीने पर रूबी खोचड़ मिली थी। वो कह रही थी कि इस साल मुक़ाबला-ए-हुस्न में उसका अव्वल आना यक़ीनी है। क्योंकि उसकी हरीफ़ सिग्रिड रब्बानी इस मर्तबा मुक़ाबले में शामिल नहीं हो रही है। जिसकी वज्ह ये है कि अनीस की इजाज़त नहीं कि वो इस क़िस्म की ख़ुराफ़ात में शिरकत करती फिरे”, लू ने झुक कर बौबी को बताया।

    “अनीस की इजाज़त नहीं?”, निशात ने दफ़अ'तन उठकर बैठते हुए पूछा, “उसे इस क़दर इख़्तियारात सिग्रिड पर कब से हासिल हो गए। क्या वो उससे शादी कर रहा है?”

    “अरे नहीं भई... शादी कौन मस्ख़रा कर रहा है”, लू ने बे-फ़िक्री से जवाब दिया।

    “हाँ। बौबी भैया हम तुमसे ये कहने आए थे कि कल मोती भाई ने हम सबको हैकमेन्ज़ मदऊ’ किया है। सिग्रिड की दावत है दर-अस्ल। मोती भाई कह रहे थे कि इस सीज़न में ये उनकी पहली पार्टी है। लिहाज़ा हम सबको शामिल होना पड़ेगा। ज़रूर आना बौबी। और तुम भी निशात...”

    “चलो बौबी डियर नाचें…”, निशात ने जमाई लेते हुए बौबी से कहा।

    अगली सुब्ह, बहुत थका माँदा और रंजीदा शक्ल बनाए मोतीलाल वाइल्ड रोज़ पहुँचा। “लो भई वुजू , मोती भाई पहुँचे”, क्वीनी ने निटिंग करते करते ऊपर के बरामदे के दरीचे में से झाँक कर वजाहत से कहा, “और इस क़दर फ़लसफ़ियों की तरह चल रहे हैं कि हद है। क्या मुसीबत है आजकल जिसे देखो ऐसा लगता है कि बस अब रो देगा।”

    मोतीलाल ज़ीने के दरवाज़े में से बरामदे में दाख़िल हो गए।

    “देखी तुमने उस क़ाज़ी अनीसुर्रहमान की हरकत। सिग्रिड को अब किसी से मिलने नहीं देता”, उसने सोफ़े पर बैठते हुए कहा। “अरे तुम नहीं जानते चची अरना की सियासत मोती भाई”, क्वीनी ने उससे कहा।

    “जहन्नुम में जाएँ चची अरना”, वो उकता कर दरीचे से बाहर देखने लगे। जहाँ सुरमई बादल तैरते फिर रहे थे। “बहर-हाल तुम लोग आज मेरी पार्टी में तो ज़रूर आओगे ना?”, उसने पूछा।

    “क़तई”, वजाहत ने शेव करते-करते जवाब दिया और आईने में अपनी नाक को बड़े ग़ौर से देखने में मसरूफ़ हो गया।

    “मैं जल्द ही बंबई जा रहा हूँ।”, ज्योतीलाल ने दफ़अ'तन सर उठा कर कहा।

    “क्यों...? ये क्या वहशत ? कम-अज़-कम टेनिस के सैमी-फाइनल्ज़ तक तो रुक जाओ। कल आ'लम काजी तुम्हें पूछ रही थी”, क्वीनी ने कहा।

    “जहन्नुम में जाए आ'लम काजी भी?”, वजाहत ने संजीदगी से पूछा।

    ज्योतीलाल हँसने लगे। वो अ'मूमन इतना नौन-सीरियस रहते कि उसे इतना संजीदा और ग़म-गीं देखकर क्वीनी को बेहद हँसी आई।

    तीसरे पहर को, जब कि सब लोग ज्योतीलाल की पार्टी में जाने की तैयारी में मसरूफ़ थे, किसी दिल-चले ने एश्ले हाल जाकर अनीस को ये ख़बर दी कि मोतीलाल ने आज सिग्रिड को मदऊ’ किया है।

    “कब? कहाँ? किस वक़्त?”, अनीस ये सुनकर तिलमिला कर उठ खड़ा हुआ। चुनाँचे उसकी मौजूदगी में किसी और की ये हिम्मत कि सिग्रिड को बाहर ले जाए।

    “अगर मोतीलाल ये समझते हैं कि वही एक अकेले शहज़ादा गुलफ़ाम हैं तो उन्हें बहुत जल्द इस मुग़ालते से निकलना चाहिए”, उसने ग़ुस्से से कहा।

    ज्योतीलाल की पार्टी का वक़्त छः बजे था। उस वक़्त सवा पाँच बजे थे। दफ़अ'तन अनीस को कोई ख़याल आया, वो तेज़ तेज़-क़दम रखता एश्ले हाल की सीढ़ियाँ उतरकर माल पर आया और हैकमैन्ज़ की तरफ़ रवाना हो गया। मिसिज़ हैकमैन के पास पहुँच कर उसने कहा वो रेस्ट्राँ का एक हिस्सा फ़ौरन अपने लिए मख़सूस करवाना चाहता है। मिसिज़ हैकमैन ने जवाब दिया कि अफ़सोस है कि वो हिस्सा एक हफ़्ते पहले ही आज शाम की एक पार्टी के लिए मख़सूस करवा लिया है।

    “क्या आप किसी तरह इस रिज़र्वेशन को कैंसल नहीं कर सकतीं?”, उसने पूछा।

    “ये किस तरह मुम्किन है मिस्टर अनीस। इसका पेशगी किराया दे दिया गया है”, उन्होंने जवाब। दिया।

    “लेकिन मैं चाहता हूँ कि आज शाम यहाँ कोई आए”, अनीस ने बच्चों की तरह ज़िद कर के कहा।

    “आप कैसी बातें करते हैं मिस्टर अनीस”, मिसिज़ हैकमैन ने जवाब दिया। “किसी रेस्ट्राँ या रक़्सगाह या किसी और पब्लिक जगह पर आप लोगों को आने से किस तरह रोक सकते हैं?”

    “लेकिन मैं चाहता हूँ कि आज यहाँ कोई आए”, अनीस ने फिर अपनी बात दुहराई। “ये तो उसी वक़्त हो सकता है कि जब आप पूरा हैकमैन्ज़ अपने लिए मख़सूस करवालें”, मिसिज़ हेक मैन ने हँसकर जवाब दिया।

    “मैं इसके लिए तैयार हूँ”, अनीस ने तक़रीबन चिल्ला कर कहा।

    “आप इसके लिए तैयार हैं? लेकिन क्या आपको मा'लूम है कि पूरे हैकमैन्ज़ का एक शाम का किराया सात हज़ार रुपये होगा?”, मिसिज़ हेक मैन ने जवाब दिया।

    “सिर्फ़...? ये लीजिए...”, अनीस ने अपनी वो ला-फ़ानी चेक-बुक निकाली और सात हज़ार का एक चैक काट कर हैरत-ज़दा मिसिज़ हेक मैन के हवाले किया।

    ज्योतीलाल का रिज़र्वेशन इस तरह ख़ुद-ब-ख़ुद कैंसल हो गया। बैरों ने जो चंद लोग इधर उधर आए बैठे थे। उनसे मुअद्दबाना अर्ज़ की, “आज सारा हैकमैन्ज़ मख़सूस करवा लिया गया है इसलिए आप हज़रात तशरीफ़ ले जाइए।”

    सारी रक़्सगाह ख़ाली हो गई छः बजा ही चाहते थे। क़ाज़ी अनीसुर्रहमान पनोलीन की सी फ़ातिहाना शान से सुनसान हाल की एक नशिस्त पर जा बिराजमान हुए और आने वाले मा'र्के के इंतिज़ार में मसरूफ़ हो गए।

    ठीक छः बजे ज्योतीलाल और सिग्रिड अपने मेहमानों की सारी पलटन समेत हैकमैन्ज़ के दरवाज़े पर पहुँचे। वो सब अंदर दाख़िल होने वाले ही थी कि एक बैरे ने गैलरी में से सर निकाल कर बड़े अदब से अर्ज़ की कि सरकार अंदर तशरीफ़ नहीं ला सकते।

    “क्या?”, मोतीलाल ने हैरत से पूछा। “मैंने अर्ज़ किया ना (बैरा लखनऊ की तरफ़ का था) कि हुज़ूर अंदर आने की ज़हमत गवारा फ़रमाइए।”

    “क्या बक रहे हो”, मोतीलाल को उस बद-तमीज़ पर सख़्त ग़ुस्सा रहा था। “एक हफ़्ता पहले मैं रिज़र्वेशन करवा चुका हूँ।”

    अब सारे मेहमान क़तार में से बेहद दिलचस्पी से गर्दनें निकाल कर ज्योतीलाल और बैरे का मुकालमा सुनने में मसरूफ़ हो गए। वो सब सड़क पर शश्दर खड़े थे और अंदर जाने से क़ासिर थे। मोतीलाल की ऐसी तौहीन आज तक किसी ने नहीं की थी। वो ग़ुस्से से सुर्ख़ हो कर चिल्लाए।

    “मिसिज़ हैकमैन को बुलाओ ये क्या मज़ाक़ है?”, मिसिज़ हैकमैन मुस्कुराती हुई बरामद हुईं।

    “ये क्या क़िस्सा है मिसिज़ हैकमैन। मैं सरीहन रिज़र्वेशन करवा चुका हूँ और अब आपका ये सख़्त ना-माक़ूल बैरा हमें अंदर जाने से रोकता है। मसूरी की तारीख़ में कभी आज तक ऐसा ख़ौफ़नाक वाक़िआ’ हुआ था?”

    “लेकिन मिस्टर ज्योतीलाल क़ानून में ये कहीं नहीं है कि अगर सारे होटल का मुझे पेशगी किराया दे दिया जाए तो मैं उसे मंज़ूर करूँ।”

    “किस गधे ने सारे होटल का किराया दिया है...?”, ज्योतीलाल गरजे।

    “हुज़ूर एश्ले हाल के क़ाज़ी अनीसुर्रहमान ने”, बैरे ने सर निकाल कर चुपके से जवाब दिया।

    दूसरे लम्हे अनीस ने गैलरी में सर निकाल कर झाँका। “हलो सिग्रिड। तुम बाहर खड़े-खड़े थक गई होगी। आओ एक प्याली क़हवा पी लो। बाहर तो काफ़ी सर्दी है”, उसने कहा।

    सिग्रिड ने मेहमानों के हुजूम में से निकल कर एक क़दम आगे बढ़ाया। फिर कुछ ठिटकी और फिर आख़िर पलट कर ज्योतीलाल को शब-ब-ख़ैर कहने और उसकी दावत का शुक्रिया अदा करने के बा'द आनन-फ़ानन गैलरी में दाख़िल हो गई।

    ज्योतीलाल और उसके मेहमान ये देखकर बाहर ऐसे मुंजमिद रह गए जैसे सब पर पाले का असर हो गया हो। अब हैकमैन्ज़ के अंदर ये रूह-अफ़्ज़ा मंज़र था कि सुनसान बाल रुम की सत्ह पर सिर्फ़ एक जोड़ा रक़्स कर रहा है। अनीस और सिग्रिड और बैंड वाले बेहद मुस्तइदी से सिर्फ़ एक जोड़े के लिए स्वानी बजा रहे हैं।

    कुछ देर अनीस उकता गया। अपने हरीफ़ को ऐसी मज़हका-ख़ेज़ शिकस्त वो बहर-हाल दे चुका था। उसने सोचा कि जब एक शाम के लिए सात हज़ार रुपये फेंके हैं तो उसे सवारत ही किया जाए। चुनाँचे वो फिर बाहर आया और माल पर पहुँच कर उसे जो शनासा नज़र आया उसे दावत दी कि चलो हमारे साथ हैकमैन्ज़ और जो जो जानने वाले उसे मिले उनसे कहा कि और जो दोस्त तुम्हें रास्ते में मिलें उन सबको लेकर हैकमैन्ज़ जाओ।

    अभी ज्योतीलाल की पार्टी वाले मेहमान सड़क ही पर थे कि उन्हें अनीस के दौड़ाए हुए स्काउट मिल गए जो इधर उधर से पकड़ कर ज़बरदस्ती के मेहमानों को जमा करते फिर रहे थे। ज्योतीलाल के मेहमान आपस में ये तय कर ही रहे थे कि अब कहाँ चला जाए कि इतने में अनीस के स्काउट उनकी तरफ़ आए और इंतिहाई ढिटाई से उन्हें अनीस की पार्टी के लिए मदऊ’ किया। मेहमानों ने कन-अँखियों से एक दूसरे को देखा। आख़िर जिस ने कहा, “शाम तो बर्बाद हो गई चलो अनीस ही की पार्टी में चलते हैं।” उनमें से बहुत से ज्योतीलाल से मा'ज़रत चाह कर दोबारा हैकमैन्ज़ चले गए। सिर्फ़ वजाहत का ग्रुप इंतिहाई वफ़ादार और मुस्तक़िल मिज़ाजी से ज्योतीलाल के साथ रह गया और स्टैंडर्ड में जाकर आईस खाने के बा'द वो सब दुनिया की बे-सबाती और इंसानों की बे-वफ़ाई पर मरसिए पढ़ते वाइल्ड रोज़ वापिस गए जो ऐसे मारकों के बा'द दोस्तों की आख़िरी जा-ए-पनाह थी।

    दूसरी सुब्ह ज्योतीलाल पहले गेट से वापिस नीचे चला गया।

    वक़्त तेज़ी से आगे निकलता गया। हर साल मसूरी में इसी तरह के नित-नए वाक़िए’ होते रहते। सिग्रिड अनीस के साथ बराबर नज़र आती रही। लेकिन अब इस क़िस्से की नौविलिटी भी कम हो चली थी। लोग किसी ज़ियादा सनसनी-खेज़ वाक़िए’ के मुंतज़िर थे जो ज़ियादा से ज़ियादा अ'र्से तक चाय की मेज़ों पर मौज़ू’-ए-गुफ़्तुगू रहे।

    लेकिन बौबी मुमताज़ अब तक मायूस हुआ था। उसे सिग्रिड पर यक़ीन था। इंसानियत की हक़ीक़ी अच्छाई पर और अपनी ज़िंदगी के उन लम्हात पर यक़ीन था। जो उसने इतने बरसों पहले 42 में अपने आपको दुनिया का ख़ुश-क़िस्मत-तरीन इंसान समझते हुए गुज़ारे थे। जब वो और सिग्रिड घंटों स्केटिंग और टेनिस की बातें किया करते थे और ज़िंदगी अच्छी थी... काएनात इतनी बश्शाश है। ये मा'सूम सपेद फूल, बिलोरीन झरने, मुक़द्दस बर्फ़ीले पहाड़, उस बुरी लड़की निशात ने उससे कहा था, “देखो... ये खुला नीला आसमान, ऊँचे दरख़्त, क़िर्मिज़ी बादल, हमारे चारों तरफ़ हर चीज़ इतनी अ'ज़ीम है, इतनी बुलंद है, इतनी फ़राख़-दिल है, ऐसे में क्या तुम ज़िंदगी से मायूस हो सकते हो। ख़ुदा और उसके बंदों से मायूस हो सकते हो?”

    47 आया। ये मसूरी में उसका आख़िरी साल था। वहाँ पर तक़सीम-शुदा पंजाब से आए हुए दौलत-मंद शरणार्थियों का एक बे-पनाह सैलाब था। जो हर तरफ़ उमँड़ रहा था। पंद्रह अगस्त आकर गुज़र चुकी थी। 15 अगस्त ‘जब पहाड़ों मलिका’ मसूरी दुल्हन की तरह सजाई गई थी। उसका हर नाचघर, हर इमारत, हर मकान सह-रंगी झंडियों और क़ुमक़ुमों से सजाया गया था। रात-रात भर जश्न होते रहे थे। पहाड़ों की मलिका ने ऐसी रौनक़, ऐसी चहल-पहल ख़ुद कभी आज तक देखी थी। ये बड़ा अ'जीब मंज़र था। ऐसा लगता था जैसे किसी डूबते हुए जहाज़ के मुसाफ़िर लाईफ़ बेल्ट्स लगा कर समंदर में कूदने के बजाए सब के सब हड़बड़ा कर जहाज़ को रक़्सगाह में एक आख़िरी नाच के लिए घुसे जा रहे हों। ओल्ड टाइमर्ज़ वहाँ अब ख़ाल-ख़ाल नज़र आते थे। एश्ले हाल सूना पड़ा था। अनीस पर उसकी बीवी ने नान-ओ-नफ़के का दावा कर रखा था और वो बड़ी परेशानी के आ'लम में मुक़द्दमे के सिलसिले में मुरादाबाद के चक्कर लगाता रहता था। सिग्रिड एक-आध दफ़ा’ सिवाए में किसी कप्तान के साथ नज़र आई थी।

    फिर वो रात आई। 9 सितंबर 47 की वाइल्ड रोज़ की आख़िरी रात। लेकिन किसी को पता नहीं था कि वो आख़िरी बार वहाँ इकट्ठे हुए हैं। वो सब आग के सामने बैठे थे। आतिश-दान में चीड़ के दरख़्त के ख़ुश्क फूलों और पाइन की छुट्टियाँ की आग दहक रही थी। बाहर हवा बहुत तेज़ थी और वाइल्ड रोज़ के पहलू में चंद गज़ के फ़ासले पर जो ऊँचा पहाड़ खड़ा था, उसकी चोटी पर से पानी के नाले ख़ूब ज़ोर से शोर मचाते हुए नीचे गिर रहे थे। और उनकी छींटें चारों तरफ़ उड़-उड़ कर बावर्ची-ख़ाने की टीन की सुर्ख़ छत पर जल-तरंग बजा रही थीं। नशिस्त के गर्म और ख़ामोश कमरे में वो सब ख़ामोश बैठे आग को देख थे...

    “फिर कोई पत्थर गिरा”, क्वीनी ने दफ़अ'तन चौंक कर कहा। सब घबरा कर दरीचे की तरफ़ देखने लगे जो पहलू के पहाड़ की तरफ़ खुलता था। उस पहाड़ पर से जो बड़े बड़े पत्थर अक्सर आप से आप लुढ़क कर नीचे गिरते थे। और नशेब में नाले की तह में जमा होते जाते थे। उस पहाड़ के नीचे से गुज़रने वाली पगडंडी पर से जाते हुए इक्का दुक्का पहाड़ी क़ुली अक्सर उन गिरते पत्थर के नीचे आकर दब जाते थे। क़ुलियों के अ'लावा उस पगडंडी पर से कोई गुज़रता था। रिक्शाओं और चहल-क़दमी करने वालों के लिए दूसरी पगडंडी थी जो वाइल्ड रोज़ के फाटक के सामने घूम कर जाती थी।

    “कहीं कोई दब गया हो”, मोतीलाल ने फ़िक्रमंदी से कहा।

    “हश्त... कोई नहीं दबा होगा”, फ़्रेड ने ये ख़याल झटक दिया।

    ऐसे ख़ुशगुवार वक़्त में जब कि वो सब आराम से आग के पास बैठे थे और बाहर बारिश हो रही थी, मौत का ख़याल निहायत मज़हका-ख़ेज़ और ग़ैर-ज़रूरी था। मौत... और दुख... सात आठ साल क़ब्ल इसी पहाड़ के नीचे से गुज़रते हुए रूबी खोचड़ का इकलौता भाई घोड़े पर से गिर कर मर गया था।

    हवाएँ शोर करती रहीं। और उस वक़्त उन सब के दिल में एक साथ एक अ'जीब ख़याल आया। दुनिया जो कुछ हम चाहते हैं हमें कभी नहीं देती। हम अहमक़ों की तरह मुँह खोले सामने मुस्तक़बिल के अँधेरे की तरफ़ देखते रहते हैं। और आख़िर-कार एक रोज़ उस अँधेरे में से मौत निकल कर आती है और हमें हड़प कर लेती है और इस सारे निज़ाम-ए-काएनात पर हमारी ग़ैर-मौजूदगी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। रूबी खोचड़ का भाई उन्ही लोगों के साथ, इसी कमरे में अक्सर इस आग के सामने बैठा करता था और अब वो मुद्दतों से वहाँ पर नहीं था। लेकिन गोया ये कोई बात ही नहीं थी।

    “एक पत्थर और गिरा”, कमला ने बाहर की आवाज़ों की तरफ़ कान लगाते हुए कहा। “होली मैरी”, लू ने ख़ौफ़-ज़दा हो कर चुपके से अपने आपको क्रास कर लिया।

    बौबी दफ़अ'तन आतिश-दान के पास से उठकर दरीचे में जा खड़ा हुआ। बहुत वसीअ’ अँधेरा वादियों और पहाड़ों पर फैला हुआ था। और इस अँधेरे को बारिश के पानी की धारें और हवा के थपेड़े काट रहे थे। और बिजली की चमक उनके लिए रास्ते बनाती जा रही थी। बौबी ने महसूस किया… मैं भी... या'नी ये इंसान... मुमताज़ अहमद, जो इस वक़्त वाइल्ड रोज़ के दरीचे में खड़ा है। इन चिंघाड़ते हुए अनासिर का एक इस क़दर बेबस और कमज़ोर हिस्सा है... रूह का कर्ब, ज़िंदगी की तड़प, दिल की बेचैनी, अनासिर की इस क़यामत-ख़ेज़ घन-गरज में घुल मिलकर ऐसी एक बे-आवाज़ सी धड़कन बन गई है। ये पहाड़, ये तूफ़ानी नाले, ये ऊँचे बे-पर्वा दरख़्त। इन सब पर मेरे वजूद के होने या होने का कोई असर नहीं पड़ता। कभी ख़ुदा आएगा और ज़िंदगी की धड़कन के ख़ात्मे के बा'द अपनी इस बे-कराँ काएनात के वीराने में बहती हुई इन पुर-शोर तूफ़ानी नद्दियों को देखकर सोचेगा। मैंने ये दुनिया क्यों बनाई थी...

    फ़्रेड आतिश-दान के पास बैठे-बैठे कोई पुराना गीत गुनगुना रहा था।

    “नहीं ज्योती भाई... इन पत्थरों के नीचे कोई दबा होगा... ख़ुदा-वंद ख़ुदा तो इतना रहम-दिल है”, फ़्रेड ने शो'लों को ग़ौर से देखते हुए आहिस्ता-आहिस्ता कहा। “मुझे इस वक़्त ऐसा लग रहा है जैसे चीड़ और पाइन के दरख़्त ख़ुदा ने इसी लिए उगाए थे कि मैं उनकी लकड़ियों से आग तापूँ, क्वीनी और वुजू और लू और तुम सब इसी लिए तख़्लीक़ किए गए थे कि मैं तुम्हारे साथ इत्मीनान और सुकून के चंद लम्हात गुज़ार सकूँ। क्वीनी और वुजू के अब्बा ने आज से पच्चीस साल पहले ये वाइल्ड रोज़ इसी लिए ख़रीदी थी कि एक रोज़ में इसके आराम-देह कमरे में आग के सामने बैठ सकूँ। वुजू तुम ख़ुश नहीं हो? बौबी मुमताज़ तुम ख़ुश नहीं हो? तुम्हें अपने वजूद के लिए ख़ुदा-वंद ख़ुदा का शुक्रगुज़ार चाहिए”, वो चुप हो कर फिर आग को देखने लगा।

    सब ख़ामोश थे। फिर वजाहत ने आहिस्ता-आहिस्ता कहा, “मैं बहुत ख़ुश हूँ ठाकुर पाल फ्रेडरिक रणबीर सिंह। लेकिन अगर ये पहाड़, जो सदियों से हज़ारों लाखों बरस से इसी तरह खड़ा है, जिसके साये में ये हमारा घर पच्चीस साल से इसी तरह मौजूद है, ये पहाड़ अगर ऐसी ही किसी तूफ़ानी रात में यक-लख़्त हमारी छत पर आन गिरे तो क्या हो...? क्या हम सब सिर्फ़ यही चाहते हैं कि हम अपने मक़ासिद में कामयाब हों, अपनी तमन्नाएँ पूरी कर सकें, शौहरत और इ'ज़्ज़त हासिल करें, अपने चाहने वालों के काम आएँ और फिर ख़त्म हो जाएँ? सबकी यही ख़्वाहिश होती है।

    तुमको यक़ीन है कि जब वो एक अच्छी, ईमानदार कैथोलिक की तरह मरेगी और आसमान पर जाएगी तो उसे फ़ौरन फ़रिश्तों के क्वीअर में शामिल कर लिया जाएगा। उसके शानों पर दो छोटे छोटे नुक़रई पर उग आएँगे और वो आँखें बंद कर के ख़ुदावंद ख़ुदा की तक़दीस की हम्दें गाया करेगी। जिसने उसे अपनी जन्नत में दाख़िल किया। एक बिल्ली जब अपने नाश्ते के बा'द आग के सामने कुशन पर मुकम्मल इत्मीनान और फ़राग़त के एहसास के साथ आँखें मूँद कर लेटी है उस वक़्त वो यक़ीनन यही सोचती होगी कि ख़ुदा एक बड़ा सा, सफ़ेद, ईरानी बिल्ला है जिसकी मूँछों में से नूर की शुआएँ निकल रही हैं”, वजाहत भी ख़ामोश हो गया।

    दरीचे के बाहर वादी के नशेब में ख़ान बहादुर साहिब की काटज में मद्धम सी रौशनी हो रही थी। और बारिश का शोर तेज़ होता जा रहा था।

    “आज की रात... आज की रात कुछ होगा... कुछ होगा”, लू ने दफ़अ'तन बेहद ख़ौफ़-ज़दा हो कर कहा। “कुछ नहीं होगा। बेवक़ूफ़ी की बातें मत करो…”, फ़्रेड ने उसे डाँट दिया। वो कुशनों को बाज़ुओं में समेट के शो'लों को देखने लगी।

    क्वीनी और वजाहत की छोटी सी भांजी जो अब तक बड़ों से अलग एक कोने में मिकी माऊस की किताब देख रही थी। यक-लख़्त अपनी जगह पर से उठकर आतिश-दान के सामने आकर बैठ गई।

    “मैं बताऊं फ़्रेड?”, उसने फ़्रेड की तरफ़ अपने छोटे छोटे हाथ फैलाए हुए कहा, “इस वक़्त मेरा जी चाह रहा है कि हम सब अपनी अपनी स्विमिंग कौसट्यूम्ज़ पहन कर बाहर के पहाड़ी नाले में जाके ग़ोते लगाएँ।”

    उसकी इस अ'जीब-ओ-ग़रीब ख़्वाहिश के इज़हार पर सबको हँसी गई।

    “बे-वकूफ़ मत बनो तलअ'त डार्लिंग”, फ़्रेड ने उसे फ़र्श पर से उठा कर गोद में बिठाते हुए कहा, “ऐसी सर्दी में अगर हम नाले में ग़ोते लगाएँगे तो सबको निमोनिया हो जाएगा और सबको हो जाए... लेकिन अगर मैं मर गया तो फिर तुम्हारी लू आंटी से कौन शादी करेगा और तुम्हें चाकोलेट कौन खिलाया करेगा?”, सब हँसने लगे।

    इसके बा'द फिर वही ख़ामोशी तारी हो गई। जिसमें सिर्फ़ घड़ी की यकसाँ टिक-टिक और बाहर की बारिश की आवाज़ मुख़िल हो रही थी।

    “ये ज़ोर का धमाका कैसा हुआ? आज रात की बारिश बड़े-बड़े पत्थरों को बहा कर नीचे ले जाएगी”, यासमीन ने कहा। “कोई नहीं कह सकता कि मौत के वक़्त की तकलीफ़ हम सब में से किसकी सबसे ज़ियादा होगी।”

    वजाहत ने कुछ सोचते हुए कहा, “मैंने अपने अज़ीज़ों और प्यारे दोस्तों को मरते देखा है। मैदान-ए-जंग में ज़ख़्मियों के दम तोड़ने का नज़ारा किया है। इन फ़सादों के ज़माने में मुझे इंसान एक दूसरे को छुरे भोंकते नज़र आए हैं। पता नहीं हमारी क़िस्मतों में किस तरह की मौत लिखी है, किस तरह की ज़िंदगी... क्या पता अगले लम्हे ही ये पहाड़ जो लाखों बरस से इस जगह खड़ा है, दफ़अ'तन अपना इरादा तब्दील कर दे और हमारे वाइल्ड रोज़ पर आन गिरे। क्वीनी एक मर्तबा सख़्त मूसलाधार बारिशों के ज़माने में नैनीताल में एक पहाड़ अपने ऊपर बसे हुए नाच-घरों और जगमगाती तफ़रीह-गाहों और मकानों को रौंदता हुआ दफ़अ'तन झील में जा गिरा था। उस रात गवर्नर के बाल रुम में एक ख़ास जश्न था, और सब नाच रहे थे और दुनिया बड़ी जवान और पुर-मसर्रत थी... दूसरे लम्हे में वो सब लाखों मन वज़नी पत्थरों से कुचले हुए पानी की तह में पड़े थे।”

    “चुप रहो वुजू…”, लू ने ख़ौफ़-ज़दा हो कर कहा।

    “हाँ चुप रहो वुजू”, क्वीनी ने डपट कर उससे कहा। “हम सब क्यों मौरबिड हो गए हैं आओ कोई बेवक़ूफ़ी का कोरस गाएँ।”

    यासमीन ने एक पुराना गीत शुरू’ कर दिया। लेकिन दफ़अ'तन वो सब फिर ख़ामोश हो गए। बारिश की आवाज़ मद्धम पड़ गई थी और नीचे ख़ान बहादुर की काटज से लगता था कि शोर-ए-क़यामत बुलंद हो रहा है।

    “क्या हुआ। क्या आग लग गई”, लू ने दरीचे की तरफ़ भागते हुए घबरा कर पूछा।

    “बको मत। ऐसी बारिश में आग कैसे लग सकती है”, फ़्रेड ने कहा। एक नौकर घबराया हुआ अंदर आया।

    “क्या बात है मुन्ने ख़ान?”, वजाहत ने परेशानी से पूछा, “सरकार नीचे मेमसाहब के घर पर एश्ले हाल वाले अनीस साहिब आए पहुँचे हैं और हल्ला कर रहे हैं और कप्तान साहिब को जान से मारे डालते हैं।”

    “कौन कप्तान साहिब रे?”, कमला ने हैरत से पूछा।

    “हुज़ूर वही जिनके साथ सिग्रिड बिटिया कल नीचे जा रही हैं।”

    “क्या?”, सबने आँखें फाड़ कर पूछा। मुन्ने ख़ान पर इस इस्तिजाब का कोई असर हुआ। वो अपनी यकसाँ आवाज़ में कहता रहा। “सरकार मैं तो बावर्ची ख़ाने में चिलम पी रहा था। जो मेमसाहब के खिदमद-गार ने आकर बताया कि वहाँ सर-फुटव्वल हो रही है।”

    “ठहरो मैं चलता हूँ।”, वजाहत ने कहा।

    क्वीनी ने उसका रास्ता रोक लिया। “मत जाओ वुजू”, वो चिल्लाई।

    “क्यों जाऊँ...? चलो भई फ़्रेड, ज्योती भाई, सब लोग, तुम लड़कियाँ यहीं रहो तमाशा देखने के शौक़ में बारिश में निकल आना।”

    ये शोर-ओ-ग़ुल सुनकर बेगम सफ़दर ऊपर से उतर आईं। “इस अँधेरे और पानी में कहाँ जा रहे हो। वुजू बावले हुए हो क्या।”, उन्होंने डाँटा।

    “मम्मी चची अरना के हाँ फ़ौजदारी हो रही है। आख़िर तो वो लोग हमारे हम-साये हैं।”, वजाहत ने बरसाती ओढ़ते हुए कहा।

    “मत जाओ वुजू…”, क्वीनी फिर चिल्लाई। “अनस मुम्किन है ड्रिंक भी पिए हो। तुम लोगों से उलझ पड़ेगा। तुम क्यों पराए फट्टे में पैर अड़ाते हो।”

    वजाहत की समझ में ये बात गई। ये एक तय-शुदा अम्र था। और सब जानते थे कि क्वीनी और वजाहत बेहद समझदार और प्रैक्टीकल लोग हैं।

    वजाहत नशिस्त के कमरे में वापिस गया। उसकी मम्मी ने खाने के कमरे में जाकर रिश्वत के तौर पर उन सब के लिए क़हवा भिजवा दिया। ताकि उनका ध्यान किसी और तरफ़ लगे। अपनी-अपनी प्यालियाँ उठाकर वो सब बौबी मुमताज़ की तरफ़ मुड़े। लेकिन वो वहाँ नहीं था।

    बौबी मुमताज़ वाइल्ड रोज़ के मुख़्तसर से अहाते की ढलवान का फ़ासला तय करके बिल्कुल ख़्वाब की सी हालत में चलता हुआ ख़ान बहादुर साहिब की काटज तक पहुँच गया। चची अरना के नौकर और कप्तान साहिब के अरदली अनीस को ज़बरदस्ती पकड़ कर रिक्शा में बिठा रहे थे। और उसके माथे से ख़ून बह रहा था।

    बौबी मुमताज़ आहिस्ता-आहिस्ता सिग्रिड के घर में पहली बार दाख़िल हुआ। दरवाज़े में वो मशहूर-ओ-मारूफ़ कप्तान दोनों हाथ बग़लों में दिए देवज़ाद फ़ौजियों की तरह टाँगें फैलाए रास्ता रोके खड़ा था। ''अब आप तशरीफ़ लाए! आप कौन बुजु़र्गवार हैं?”, उसने डपट कर बौबी से पूछा।

    बौबी बे-परवाई से उसे सामने से हटाता हुआ अंदर के कमरे में पहुँच गया। सिग्रिड सोफ़े पर औंधी लेटी ज़ोर-ज़ोर से सिसकियाँ भर रही थी। रोते-रोते उसकी आँखें गुलाबी हो चुकी थी।

    “सिग्रिड”, बौबी ने बिल्कुल क़ुरून-ए-वस्ती के रूमानी सूरमाओं की तरह सोफ़े के क़रीब फ़र्श पर दो-ज़ानू झुक कर आहिस्ता से कहा। वो उसी तरह सिसकियाँ भरती रही।

    “सिग्रिड”, उसने दोबारा उसे पुकारा।

    “ये तुम हो बौबी”, बिल-आख़िर सिग्रिड ने आँखें खोल कर उसे ग़ौर से देखते हुए धीरे से कहा, “तुम हो... लेकिन तुम तो बहुत देर करके आए हो बौबी मुमताज़। अब तुम वापिस चले जाओ।”

    “मैं वापिस क़तई’ नहीं जाऊँगा”, बौबी ने बच्चों की तरह ज़िद से कहा। “तुमको मेरे साथ चलना होगा। समझीं तुम। मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा। अगले हफ़्ते में पाकिस्तान जा रहा हूँ वहाँ हम...”

    “नहीं बौबी”, वो अपने छोटे-छोटे सफ़ेद हाथों से आँखें मलते हुए तअस्सुफ़ से बोली। “तुम बहुत स्वीट हो। लेकिन मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकती। मैं कल सुब्ह इस कप्तान के साथ नीचे जा रही हूँ। वहाँ मैं इससे शादी कर लूँगी।”

    “तुम... तुम इस अक्खड़ आदमी से शादी कर लोगी”, बौबी ने फ़र्श पर से उठते हुए तक़रीबन चिल्ला कर कहा।

    “हाँ...।”, सिग्रिड की गहरी साफ़ आवाज़ नीम-तारीक कमरे में आहिस्ता से गूँजी। “इस शख़्स को मुझसे शादी करनी पड़ेगी।”

    “तो क्या-क्या वो सब बातें सही हैं”, बौबी ने बेहद दुख के साथ रुकते हुए पूछा, “मेरा मतलब है। वो सब अफ़्वाहें?”, कोई चीज़ उसके हल्क़ में अटकी।

    “हाँ। बिल्कुल सही…”, सिग्रिड ने सुकून के साथ जवाब दिया। “अच्छा ख़ुदा-हाफ़िज़। बौबी मुमताज़ अब तुम वापिस जाओ, बारिश फिर आने वाली है... तुम बहुत स्वीट हो। ख़ुदा तुम्हारे साथ रहे।”, वो सोफ़े पर से उठ खड़ी हुई।

    वो बाहर गया। बारिश फिर शुरू’ हो चुकी थी। और बिजली ज़ोर-ज़ोर से कड़क रही थी।

    उस रात 9 सितंबर की उस तूफ़ानी रात क्वीनी और वजाहत अपने दोस्तों को रुख़स्त करने के बा'द सोने के लिए ऊपर जा चुके थे। तो बारह बजे के क़रीब टोटो बनर्जी का फ़ोन आया। “यहाँ भी यक-लख़्त फ़साद शुरू’ हो गया है। अभी-अभी माल पर कई आदमियों को छुरे भौंके गए हैं। तुम सब सुब्ह होते ही जिस क़दर जल्द हो सके देहरादून चले जाओ। भगवान ने चाहा तो हम सब फिर जल्द ही अच्छे दिनों में दोबारा मिलेंगे। भगवान तुम्हारे साथ रहें”, वो कह रही थी।

    उन्होंने रातों रात जिस क़दर मुम्किन हो सका सामान पैक किया और सुब्ह पौ फटते समय मसूरी को अल-विदाअ’ कह कर नीचे जाने के लिए तैयार हो गए। बारिश रात-भर बरस कर थम चुकी थी। बहुत सुहानी और ठंडी हवाएँ चल रही थीं। हर चीज़ धुली-धुलाई और तर-ओ-ताज़ा थी। बारिश से धुली हुई चटानों और पगडंडियों पर इंसानी ख़ून के छींटे चारों तरफ़ ज़ियादा तेज़ी और सुर्ख़ी से चमक रहे थे। जिस वक़्त क्वीनी वाइल्ड रोज़ के दरवाज़े बंद करवाने में मसरूफ़ थी चची अरना का फ़ोन आया। वो फूले हुए साँस से कह रही थी कि वो लोग सिग्रिड को भी अपने साथ लेते जाएँ।

    “लेकिन चची सिग्रिड और आप सब तो कप्तान साहिब के साथ ज़ियादा हिफ़ाज़त से जा सकती हैं फ़ौजी कोनवाए के साथ”, क्वीनी ने उनसे कहा। “वो...? वो कमबख़्त तो सुब्ह होते ही जान बचा कर पहले कोनवाए के साथ भाग गया। मुझे डर है कि इसी तरह सिग्रिड को छोड़कर वो देहरादून से और आगे निकल जाए”, चची अरना ने कहा।

    “अच्छा चची मैं अभी बौबी मुमताज़ को फ़ोन किए देती हूँ। वो आप लोगों के लिए ट्रक का इंतिज़ाम कर देगा। उसे हुकूमत ने (Evacuation) के इंतिज़ाम के लिए ही रोक लिया है”, क्वीनी ने कहा और जल्दी से फ़ोन पर बौबी को चची अरना का पैग़ाम पहुँचा दिया...

    जिस वक़्त क्वीनी का फ़ोन पहुँचा। बौबी मुंतज़िम ऑफ़िसर के दफ़्तर में बैठा कोनवाईज़ की फ़हरिस्त पर नज़र डालने में मसरूफ़ था। लहज़ा-ब-लहज़ा फ़साद का ज़ोर बढ़ता जा रहा था। क्वीनी की इत्तिला पर उसने फ़ौरन चंद सिपाही ख़ान बहादुर साब के घर की तरफ़ रवाना किए। और दफ़्तर से बाहर आया। ख़ुदावंदा... कैसी अ'जीब-ओ-ग़रीब सूरत-ए-हाल थी वो ख़ुद उसे अपने से दूर भेजने का इंतिज़ाम कर रहा था। वो देर तक सर खुजाता रहा। अरदली के हाथ क्या वो उसे एक पर्चा भी भेज दे। लेकिन ये एक इंतिहाई जज़्बाती बात होगी। फिर उसने सोचा वाह। इसमें जज़्बातीयत का क्या सवाल है। अरे भई वो उसे इंतिज़ामी सर्विस के एक ज़िम्मेदार रुक्न की हैसियत से ये सरकारी इत्तिला दे रहा है कि फ़लाँ-फ़लाँ वक़्त पर उसे मिल्ट्री कोनवाए के साथ नीचे भेजा जाएगा बस।

    आख़िर बड़े सोच बिचार के बा'द उसने लिखा, “डियर मिस रब्बानी...” फिर उसे काट कर डियर सिग्रिड कर दिया... “डियर सिग्रिड। आज चार बजे सह-पहर को तुम लोगों के लिए फ़ौजी हिफ़ाज़त की गाड़ी का इंतिज़ाम कर दिया गया है। ख़ुदा करे ख़ैरियत से नीचे पहुँच जाओ। फ़क़त बौबी।” लेकिन फिर इंतिहाई बे-साख़्तगी से उसके क़लम से निकल गया। “सिग्रिड... सिग्रिड... सोचो तो... तुम्हारे नाम या'नी मिस सिग्रिड रब्बानी के नाम ये मेरा पहला और आख़िरी ख़त है, क्योंकि मुम्किन है आज ही शाम से या कल से तुम मिसिज़ उस्मान बन जाओगी।”

    ख़ुदावंदा... ये निहायत ही बे-तुकी बात थी जो उसने लिखी। लिहाज़ा उसने तय किया कि आख़िर में ये भी लिख दे कि मेरी बेहतरीन ख़्वाहिशें और दुआएँ हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी। चुनाँचे उसने ये जुमला भी बढ़ा दिया। और लिफ़ाफ़ा बंद करने लगा। यक-लख़्त उसे ख़याल आया कि ये इंतिहाई ग़लत बिल्कुल झूट बात उसने लिखी कि उसकी बेहतरीन ख़्वाहिशें हमेशा उसके साथ रहेंगी। वो उन आइडल क़िस्म के हीरोज़ में से क़तई’ नहीं था। जो अपनी महबूबा की शादी के वक़्त निहायत आ'ला हौसलगी से कहते हैं कि तुम जहाँ रहो ख़ुश रहो और तुम्हें ख़ुश देखकर मैं भी ख़ुश हो लिया करूँगा। लाहौल वला-कू, उसे हँसी गई। अभी वो कुछ तय कर पाया था कि यही ख़त भेज दे या दूसरा पर्चा लिखे कि सामने से रिक्शा में निशात स्टेनले आती नज़र आई।

    “ओ... हलो बौबी”, वो चिल्लाई... वो ज़रा परेशान हो कर उसके क़रीब पहुँचा।

    “अरे घबराओ मत, तुम्हारा बिल्कुल ईसाईयों वाला नाम है। इसलिए तुम्हें कोई छुरा भौंकेगा वो हँसते हुए बोली। “मुसीबत तो मेरी है कि ग़ैर-मुस्लिम होते हुए भी मेरा मुसलमानों जैसा नाम है। अब मैं किरपान से महफ़ूज़ रहने के लिए अपना बपतिस्मा वाला नाम इख़तियार करने वाली हूँ। आओ चल कर कहीं क़हवा पिएँ। ये दिन अब कहाँ मयस्सर होंगे... तुम सब भागे जा रहे हो।”, उसकी नुक़रई आवाज़ में तअस्सुफ़ था।

    वो ग़ैर-यक़ीनी तौर पर वहीं ठिटका खड़ा रहा। “बे-वक़ूफ़ मत बनू... चलो मेरे साथ”, उसने बड़ी बहनों की तरह डाँटा और उसे खींच कर रिक्शा में बिठा लिया। वो स्टैंडर्ड की तरफ़ रवाना हो गए।”

    “सुनो तुम्हें एक बात बताऊँ”, उसने पर्स खोल कर एक लिफ़ाफ़ा निकालते हुए कहा। “कल डैडी का इलाहाबाद से तार आया है। मैं अमरीका जाने का इरादा कर रही थी ना। उसके लिए मुझे जहाज़ में जगह मिल गई है। तुम भी चलते हो अमरीका? चले-चलो बौबी। मैं तुम्हें यक़ीन दिलाती हूँ कि तुम बहुत जल्द सबको भूल जाओगे। ये सारा सिग्रिड फ़िग्रिड का क़िस्सा... हमेशा ऐसा ही होता है। लेकिन अभी तो कुछ अ'र्सा तक तुम यूँही अहमक़ों की तरह मुँह खोले बैठे रहोगे।”, वो हँसने लगी।

    वो स्टैंडर्ड पहुँच गए। ऊपर जाकर वो अपने पसंदीदा गोशे में बैठ गई। और बैरे को आवाज़ देने के लिए चारों तरफ़ देखा। सारा हाल बिल्कुल ख़ाली पड़ा था। बाहर सड़कों पर से बलवाइयों की हाहा-कार की आवाज़ें हवा में तैरती हुई आकर खिड़कियों के शीशे से टकरा रही थीं। कुछ देर वो दोनों ख़ामोश बैठे रहे, वो ग़ैर-इरादी तौर पर चंद लम्हों स्वानी! नो हाव आई लव यू... हाव आई लव यू, का पामाल नग़्मा गुनगुना कर मेज़ पर जाज़ की गत बजाती रही, फिर दफ़अ'तन चुप हो कर किसी गहरी सोच में डूब गई।

    बैरा क़हवा ले आया। बौबी ने ख़ामोशी से अपनी प्याली ख़त्म की और जाने के लिए उठ खड़ा हुआ। “बौबी, क्या तुमको बहुत जल्दी है। कोई ज़रूरी काम है?”, निशात ने पूछा। “नहीं तो”, बौबी ने ग़ैर-यक़ीनी लहजे में जवाब दिया। “अच्छा तो सुनो।”, वो रंजीदा आवाज़ में बोली। “थोड़ी देर मेरे पास और बैठे रहो।”, वो फिर कुर्सी पर बैठ गया। वो ख़ामोश रही।

    “बौबी डियर…”, कुछ देर बा'द उसने दफ़अ'तन कहा। “ख़ुदा-वंद ख़ुदा की इस ख़ूबसूरत दुनिया में तुम्हें कहीं से ख़ुलूस मिल गया है? पाकीज़ा और शरीफ़ ख़ुलूस?”, वो अपनी जगह से उठकर दरीचे में जा खड़ी हुई। और उसके सर्व शीशों पर अपनी उँगलियाँ रखकर उन्हें ग़ौर से देखने लगी, “बौबी डियर”, उसने आहिस्ता से कहा। “मैंने एक दफ़ा’ कारलेगी की एक किताब पढ़ी थी। उसमें उसने लिखा था कि अगर एक कुत्ते पर भी तुम मेहरबान हो और उससे किसी गली में मिलो तो वो दस फुट के फ़ासले पर होगा तो अपनी दुम हिलाने लगेगा। अगर तुम उसकी पीठ थपक दो तो ख़ुशी से फूला समाएगा। ये इज़हार-ए-मोहब्बत किसी ख़ुद-ग़र्ज़ी की वज्ह से नहीं है। वो तुम्हारे हाथ कोई जाएदाद बेचना नहीं चाहता। वो तुमसे शादी का ख़्वास्तगार है। बौबी डियर क्या तुमने कभी ग़ौर किया है कुत्ता ही एक ऐसा जानवर है जिसको बग़ैर काम किए खाने को मिल जाता है। मुर्ग़ी अंडे देती है। गाय दूध देती है, बुलबुल नग़्मा-सराई करती है लेकिन कुत्ता अपनी बसर औक़ात सिर्फ़ मुहब्बत पर करता है।” वो रुक गई। “मैं इस वक़्त कैसी अ'जीब बातें कर रही हूँ।”

    वो फिर अपनी उँगलियों को ग़ौर से देखने लगी, “क्या तुम जानते हो बौबी मुमताज़ कि औरतें सिर्फ़ ख़ुलूस की परस्तिश करना चाहती हैं। और नर्मी। और मेहरबानी। क्या हम इतना भी नहीं कर सकते कि ज़िंदगी में एक दूसरे के साथ इस तरह का बरताव करें। जिससे ये महसूस हो सके कि यहाँ पर ख़ुलूस है और आसाइश, और मुहब्बत, और ज़िंदगी की सादगी।” फिर वो यक-लख़्त दरीचे की तरफ़ से मुड़ी और गहरी और रंजीदा, साफ़ आवाज़ में कहने लगी, “बौबी... तुम्हारी वो बेहद मुअज़्ज़िज़ बहन क्वीनी मुझे क्या समझती है? ग़ालिबन कुत्ता या बिल्ली या उसी क़िस्म का कोई बे-अ'क़्ल और आसाइश-पसंद जानवर... या उससे भी कोई कमतर चीज़... तुम मेरा मतलब समझते हो ना... सुनो…”, उसने कुर्सी पर वापिस आकर बैठते हुए कहा। “तुम जब कभी उससे मिलो... तुम क्वीनी से ज़रूर मिलोगे। हम सब एक दूसरे से अच्छे दिनों में दोबारा कभी कभी ज़रूर मिलेंगे। तो तुम क्वीनी से कहना कि दुनिया की सारी इ'ज़्ज़त, अख़लाक़ का सारा आ'ला मेया'र, सारी अच्छाई सिर्फ़ उसी की मिल्कियत नहीं है। दुनिया के बुरे इंसान भी उतने ही अच्छे बन सकते हैं। ये सारी बुरी लड़कियाँ... रूबी खोचड़, और अनवरी ख़ाँ और सिग्रिड रब्बानी भी उसी की तरह अच्छी और ऊँची बन सकती हैं। इंसानियत की हक़ीक़ी और आख़िरी अच्छाई हम सब में मौजूद है। हम सब ख़ुलूस और मुहब्बत और ज़िंदगी की सादगी के अहल हैं।”, फिर वो चुप हो गई। उसकी आँखों में आँसू छलक रहे थे।

    बौबी ने पहली मर्तबा उस हमेशा हँसते और नाचते रहने और दूसरों का मज़ाक़ उड़ाने वाली लड़की की आँखों में आँसू देखे। उसने क्वीनी की आँखों में आँसू देखे थे, जब पिछले दिनों वजाहत को बरूँ को निमोनिया हो गया था। उसे यासमीन रोती नज़र आई थी जब उसका बिल्ली का बच्चा मर गया था। उसने लू को चुपके से आँसू पोंछते देखा था। जब फ़्रेड उसे डाँट देता था। लेकिन निशात स्टेनले के आँसू। ये बिल्कुल नई और ग़ैर-मुतवक़्क़े’ चीज़ थी।

    दूसरे लम्हे वो सँभल कर बैठ गई। “अच्छा बौबी। अब तुम चले जाओ। फ़साद ज़ोरों पर है ख़ुदा करे तुम ख़ैरियत से यहाँ से निकल सको। मुझे कभी-कभी याद कर लेना... ख़ुदा-वंद ख़ुदा हमेशा तुम्हारे साथ रहे...”

    वो भारी-भारी क़दम रखता ज़ीना तय करके नीचे गया। उसी रोज़ आख़िरी गेट से वो भी मसूरी को ख़ैरबाद कह कर मैदानों में गया। और पाकिस्तान की तरफ़ रवाना गया।

    दूसरे दिन वाइल्ड रोज़ लूट लिया गया। उसके सजे हुए ख़ूबसूरत कमरे उ'म्र-भर की मेहनत और शौक़ से जमा की हुई किताबें और तस्वीरें, पुराने नवादिर से सजा हुआ लाऊंज सब का ख़ात्मा बिल-ख़ैर हो गया। एश्ले हाल में भी आग लगा दी गई और उसकी सारी शान-ओ-शौकत पलक झपकते में अल्लाह को प्यारी हुई।

    वाइल्ड रोज़ के मशरिक़ी दरीचे से चंद गज़ के फ़ासले पर जो ख़ूबसूरत सर-सब्ज़ पहाड़ लाखों बरस से वहाँ खड़ा था उसी सुकून और बे-नियाज़ी से मौजूद रहा। उसके झरने उसी तरह मुतरन्निम थे। और इस पर सफ़ेद और नीले फूल खिल रहे थे। वक़्त तेज़ी से आगे निकलता गया।

    फिर बौबी मुमताज़ ने किसी से सुना कि निशात स्टेनले न्यूयार्क पहुँच गई है। क्वीनी और उसका ग्रुप लखनऊ में था। मोतीलाल की बंबई की ज़िंदगी यक़ीनन वैसी ही गुज़र रही होगी। उनका वाल केशवर रोड का मकान फ़िल्म, स्टूडियोज़। रेस कोर्स। फिर उसने सुना कि वो लखनऊ फ़्लाईंग क्लब के एक सर-गर्म मैंबर बन गए हैं। और घंटों अपना तय्यारा फ़िज़ा में उड़ाते फिरने के बा'द जब ज़मीन पर उतरता है तो माया के इस चक्कर से काफ़ी मुतमइ'न मा'लूम होता है।

    मग़रिबी यूपी के फ़सादों में बेहद नुक़्सान उठाने के बा'द अनीस अपने बीवी बच्चों के साथ लाहौर गया था। और किसी कारोबार की फ़िक्र में था। वो मसूरी के ज़माने सब ख़्वाब-ओ-ख़याल हो गए

    ख़ुदावंदा... ये छः साल... ये छः साल... घड़ी उसी तरह टिक-टिक करती रही... आठ पचपन... बराबर के कमरे में रेडियो पर मौसम की रिपोर्ट जारी थी। “आज शुमाल में बर्फ़-बारी होगी। शुमाल मग़रिब में बारिश के छींटे पड़ेंगे। जुनूब में तेज़ हवाएँ चलेंगी।”

    कार्ड रुम में से कुछ लोग फिर बराबर वाले कमरे में वापिस गए। उनकी बातों की आवाज़ रेडियो की आवाज़ पर ग़ालिब गई। “ये क्या इस महीने का औन है?”, किसी ने अपने साथी से पूछा। ''हाँ”, दूसरे ने जवाब दिया।

    औनलुकर के वरक़ सरसराने लगे। “अरे ये किसकी तस्वीर है... मिसिज़ सिग्रिड उसमान... पहले ने एक सफ़्हे पर रुक कर पूछा। “ओह... ये है सिग्रिड उसमान...?”, दूसरे ने कहा। “आह... दैट रब्बानी गर्ल... ख़ूब चीज़ थी।”, तीसरी आई।

    “हाँ। लेकिन अफ़सोस कि उसने शादी कर ली... कब की?”, चौथे ने पूछा। “सितंबर में ग़ालिबन... मैं तो उस वक़्त तक जबलपूर ही में था। जब मैंने सुना था कि उसमान छुट्टी लेकर शादी करने मसूरी जा रहा है।” पहले ने जवाब दिया। “ओह...!”, फिर वो सब इधर-उधर की बातों में मशग़ूल हो गए।

    सुनसान लाऊंज में बैठे-बैठे बौबी मुमताज़ ने फिर घड़ी पर नज़र डाली। सैकेंड और मिनट की सूईयाँ टिक-टिक करती आगे बढ़ती जा रही थीं। नौ बज चुके थे। वो खाने के हाल की तरफ़ जाने के लिए लाऊंज में से निकल कर गैलरी के दरवाज़े में गया। गैलरी के इख़्तिताम पर तारीक बरामदे में से गुज़रती हुई दो लड़कियाँ ड्राइंगरूम की तरफ़ जा रही थीं।

    “ओह... ये उसकी बिल्कुल शराब उंडेलने वाली आँखें…”, उनमें से एक ने बौबी को गैलरी में से निकलता देखकर चुपके से अपनी साथ वाली लड़की से कहा। “हाँ... बिल्कुल शराब उंडेलने वाली आँखें।”, दूसरी ने आहिस्ता से उसकी राय से इत्तिफ़ाक़ ज़ाहिर किया। वो दोनों आगे जाकर सुतूनों के साये में ग़ाइब हो गईं।

    अंदर उसी तरह अजनबी लोगों की बातें जारी थीं। बौबी... बौबी... वो सारी पुरानी मानूस आवाज़ें अँधेरे में डूबती चली गईं। बौबी... बौबी... बौबी मुमताज़...

    “मुमताज़ साहिब…”, उसने चौंक कर पीछे मुड़कर देखा। उसके मेज़बान की बेगम साहिबा बरामदे की सीढ़ियों पर हाथ में नाश्ता-दान थामे खड़ी थीं। “मुमताज़ साहिब वाह आप भी ख़ूब हैं। हम इतना आपको रोकते रहे और आप बग़ैर खाना खाए ही भाग आए। आज तो मेरी सई'दा ने ख़ुद सेवईयाँ पकाई हैं... बड़ा शौक़ है उसे खाना पकाने का... उसके अब्बा बुर्ज खेलने क्लब रहे थे। तो मैंने सोचा सेवइयों की एक प्लेट उनके हाथ आपको भेज दूँ... फिर मैं ख़ुद ही चली आई।”

    वो एक लंबा, गहरा साँस खींच कर बरामदे में गया।

    बाहर बर्फ़ गिरनी शुरू’ हो चुकी थी।

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