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हास्य
मुख़्तसर सी रस्म-ए-ख़तना और उस पर तीस शे'र
अक़्द के दो बोल की तक़रीब और चालीस शे'र
रज़ा नक़वी वाही
शेर
ज़रा रहने दो अपने दर पे हम ख़ाना-ब-दोशों को
मुसाफ़िर जिस जगह आराम पाते हैं ठहरते हैं
लाला माधव राम जौहर
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शेर
यार पर इल्ज़ाम कैसा ऐ दिल-ए-ख़ाना-ख़राब
जो किया तुझ से तिरी क़िस्मत ने उस ने क्या किया
लाला माधव राम जौहर
ग़ज़ल
रस्म-ओ-राह-ए-का'बा-ओ-बुत-ख़ाना से हूँ बा-ख़बर
मुख़्तलिफ़ अंदाज़ के सज्दे किया करता हूँ मैं
अम्न लख़नवी
नज़्म
स्वामी राम तीरथ
ہم بغل دريا سے ہے اے قطرہ بے تاب تو
پہلے گوہر تھا ، بنا اب گوہر ناياب تو
अल्लामा इक़बाल
क़ितआ
इन दिनों रस्म-ओ-रह-ए-शहर-ए-निगाराँ क्या है
क़ासिदा क़ीमत-ए-गुल-गश्त-ए-बहाराँ क्या है