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तंज़-ओ-मज़ाह
फ़िराक़ गोरखपुरी
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chaah-e-zamzam
चाह-ए-ज़मज़मچاہِ زَمزَم
मक्का के उस चश्मे का नाम है जिससे ज़म-ज़म का पानी निकलता है, प्यास की तेज़ी में पैग़म्बर इस्माईल के एड़ीयाँ रगड़ने पर ख़ुदा की आज्ञा से वहाँ एक चशमा उबलने लगा जिसे ज़म-ज़म कहा गया कुछ समय बाद यह चशमा सूख गया फिर अधिक समय गुज़रने के बाद अब्दुल मुत्तलिब (पैग़म्बर मुहम्मद के दादा) को सच्चे सपने में उस स्थान पर कुवाँ खोदने के लिए कहा गया उन्होंने ख़ाना-ए-काबा के क़रीब कुवाँ खुदवाया तो वह चाहे ज़मज़म के नाम से प्रसिद्ध हुआ और आज तक जारी है और लाखों हाजी इससे लाभान्वित होते हैं
chah-e-zamazam
चह-ए-ज़मज़मچَہِ زَمَزَم
رک : چاہ زمزم .
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ग़ज़ल
मता-ए-कौसर-ओ-ज़मज़म के पैमाने तिरी आँखें
फ़रिश्तों को बना देती हैं दीवाने तिरी आँखें
साग़र सिद्दीक़ी
नज़्म
लम्हों की परस्तार
हुक्म-ए-हव्वा की क़सम जज़्बा-ए-आदम की क़सम
पाक थी रूह मिरी चश्मा-ए-ज़मज़म की क़सम
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
'आरिश' सुराही-दार सी गर्दन के सेहर में
ज़मज़म सी गुफ़्तुगू को भी रम गिन रहा हूँ मैं
सरफ़राज़ आरिश
मर्सिया
इस रुकन को यूं उम्मत बेदीन गिरा दे
हज तुम ने किया काबे का जब चशम इधर है